सरकारी अस्पतालों में बेड कम, प्राइवेट इलाज 8 गुना महंगा! बिल पर कैसे लगेगी लगाम?

सरकारी अस्पतालों में 0.79 बेड प्रति 1,000 आबादी और निजी इलाज 7.6 गुना महंगा है. संसदीय समिति ने प्राइवेट अस्पतालों की कीमत, रूम रेंट और दवाओं पर कैप सुझाया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सरकारी अस्पतालों में 0.79 बेड प्रति 1,000 आबादी और निजी इलाज 7.6 गुना महंगा है. संसदीय समिति ने प्राइवेट अस्पतालों की कीमत, रूम रेंट और दवाओं पर कैप सुझाया है.

भारत में इलाज का खर्च बड़ी चिंता बनता जा रहा है. एक तरफ सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ और बेड की कमी है, तो दूसरी तरफ निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च कई गुना ज्यादा पड़ता है. इसी समस्या पर संसद की स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति ने अपनी 176वीं रिपोर्ट में कई बड़े सुझाव दिए हैं. रिपोर्ट 7 अगस्त 2026 को राज्यसभा में पेश और लोकसभा में रखी गई. समिति ने कुल 368 सिफारिशें की हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में हर 1,000 लोगों पर सिर्फ 0.79 अस्पताल बेड हैं. सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च करीब GDP का 1.43% है, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य इसे 2.5% तक पहुंचाने का है. यानी एक तरफ मरीजों की जरूरत बढ़ रही है और दूसरी तरफ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकारी अस्पताल सस्ता इलाज देते हैं, तो बड़ी संख्या में मरीज निजी अस्पतालों का रुख क्यों करते हैं? और अगर निजी अस्पतालों में इलाज इतना महंगा है, तो सरकार उनके बिल पर लगाम कैसे लगाएगी?

पैसा कहां खर्च हो रहा है?
रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट का करीब 51% हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है. इसके मुकाबले माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं को करीब 28% और गंभीर यानी तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं को केवल 11% हिस्सा मिलता है. इसका मतलब है कि गंभीर बीमारी के लिए जरूरी बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ सेवाओं में निवेश अपेक्षाकृत कम है. नतीजा यह होता है कि मरीज बेहतर या तुरंत इलाज की तलाश में निजी अस्पतालों की ओर चले जाते हैं. रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रशासनिक निगरानी पर करीब 8% खर्च होने की भी बात कही है, जो स्वास्थ्य प्रबंधन के राष्ट्रीय औसत से दोगुना बताया गया है.

सरकारी और निजी अस्पताल के खर्च में जमीन-आसमान का अंतर
यहां सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा अस्पताल में भर्ती होने के खर्च का है. NSO के 2025 के स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, सरकारी अस्पताल या सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान में भर्ती होने पर औसत जेब से खर्च ₹6,631 रहा. वहीं निजी अस्पताल में यही औसत खर्च ₹50,508 रहा. यानी निजी अस्पताल में खर्च सरकारी अस्पताल से करीब 7.6 गुना था.

निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच यह अंतर सिर्फ इलाज की फीस का नहीं है. कमरे का किराया, डॉक्टर की फीस, जांच, दवाएं और दूसरी सेवाओं के अलग-अलग शुल्क से कुल बिल तेजी से बढ़ सकता है. यही वजह है कि संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों में इलाज और जांच की कीमतों को तय और सीमित करने के लिए एक स्थायी व्यवस्था बनाने की सिफारिश की है.

अब निजी अस्पतालों के बिल पर कैसे लगेगी लगाम?
समिति चाहती है कि जरूरी इलाज, सामान्य प्रक्रियाओं, विशेषज्ञ इलाज और मेडिकल जांच के लिए कीमत तय करने और अधिकतम सीमा तय करने का सिस्टम बनाया जाए. इसका मकसद यह है कि मरीज अस्पताल पहुंचने के बाद ऐसे बिल का सामना न करे, जिसकी उसे पहले जानकारी ही न हो. समिति ने निजी अस्पतालों में पारदर्शी शुल्क व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है. यानी मरीज को पहले से पता हो कि कमरे, जांच और इलाज पर कितना खर्च आएगा.

विशेषज्ञ इलाज के खर्च पर भी अधिकतम कीमत तय करने की व्यवस्था बने.
निजी अस्पतालों में इलाज के दूसरे खर्चों पर भी लगाम लगाने के उपाय हों.
मरीज को पहले से कमरे, जांच और इलाज की पूरी कीमत बताई जाए.
निजी अस्पतालों में शुल्क व्यवस्था पारदर्शी बनाने की सिफारिश की गई.
अस्पताल के कमरे का किराया आसपास के 3-स्टार होटल से ज्यादा न हो.
आसपास के 3-स्टार होटलों का औसत टैरिफ रूम रेंट का बेंचमार्क बने.
ज्यादा रूम रेंट से बढ़ते कुल इलाज खर्च पर लगाम लगाने का सुझाव.
सर्जरी के लिए पैकेज रेट तय करने की सिफारिश की गई.
मेडिकल डिवाइस और दवाओं के मार्कअप पर भी कीमत की सीमा तय हो.
मेडिकल डिवाइस की लैंडिंग कॉस्ट और MRP का अंतर 20% से ज्यादा न हो.
दवाओं की लैंडिंग कॉस्ट और MRP का अंतर भी 20% तक सीमित हो.
कार्डियक स्टेंट की तरह Peripheral Stents की कीमतें भी तर्कसंगत हों.
Drug-Eluting Balloons की कीमतें भी नियंत्रित करने की सिफारिश की गई.

जन औषधि केंद्र भी निजी अस्पतालों में?
दवाओं के खर्च को कम करने के लिए समिति ने एक और बड़ा सुझाव दिया है. उसने सरकारी योजनाओं से जुड़े सभी बड़े निजी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र खोलने की सिफारिश की है. इसका मकसद मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना है. सरकार के मुताबिक, 30 जून 2026 तक देश में 20,149 जन औषधि केंद्र थे और इनके जरिए पिछले 12 वर्षों में लोगों को करीब ₹45,000 करोड़ की अनुमानित बचत हुई है.

इलाज का खर्च सिर्फ अस्पताल में नहीं बढ़ता
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य बीमा का बड़ा हिस्सा अस्पताल में भर्ती होने वाले इलाज पर केंद्रित है. लेकिन मरीज का खर्च सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने से नहीं होता. डॉक्टर की फीस, जांच, दवाएं और लंबे समय तक चलने वाली बीमारी का इलाज भी परिवार की जेब पर भारी पड़ सकता है.

यही कारण है कि समिति ने उन लोगों के लिए स्वैच्छिक और योगदान आधारित स्वास्थ्य बीमा मॉडल बनाने का सुझाव दिया है, जो सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के दायरे में नहीं आते और निजी बीमा भी आसानी से नहीं खरीद पाते. इसी वर्ग को अक्सर मिडिल मैन कहा जाता है. यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि NSO के 2025 सर्वे के अनुसार स्वास्थ्य बीमा कवरेज में सुधार हुआ है और 2025 तक ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 47.4% और शहरी क्षेत्रों में 44.3% लोगों का कवरेज था. फिर भी अस्पताल में भर्ती होने पर औसत जेब से खर्च ₹34,064 रहा.

AIIMS में भीड़ कम होगी तो निजी अस्पतालों का दबाव भी घटेगा
समिति ने इलाज की कीमत कम करने के साथ-साथ सरकारी अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है. दिल्ली के उत्तरी हिस्से में एक नया स्वतंत्र AIIMS या पूरी तरह तैयार सैटेलाइट सेंटर बनाने की सिफारिश की गई है. समिति का मानना है कि बड़े सरकारी संस्थानों पर मरीजों का दबाव कम होगा तो इलाज के लिए मजबूरी में निजी अस्पताल जाने वाले मरीजों की संख्या भी घट सकती है. यानी समाधान सिर्फ निजी अस्पतालों की कीमत नियंत्रित करना नहीं है. सरकारी अस्पतालों में बेड, डॉक्टर, जांच और विशेषज्ञ सुविधाएं बढ़ाना भी जरूरी है.

कॉरपोरेट अस्पताल और मेडिकल टूरिज्म का पैसा कहां जाता है?
समिति ने मेडिकल टूरिज्म और बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों की बढ़ती कमाई का भी जिक्र किया है. बड़े अस्पताल विदेश से आने वाले और ज्यादा खर्च करने वाले मरीजों से अच्छी कमाई कर रहे हैं. रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि ऐसी संस्थाओं में क्रॉस-सब्सिडी मॉडल बनाया जाए. यानी ज्यादा भुगतान करने वाले मरीजों और मेडिकल टूरिज्म से होने वाली कमाई का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर भारतीय मरीजों की गंभीर बीमारियों के इलाज पर लगाया जाए.

असली चुनौती क्या है?
संसदीय समिति की सिफारिशों का उद्देश्य सिर्फ बिल कम करना नहीं है. इसमें पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को तीन स्तरों पर सुधारने की कोशिश दिखती है. सरकारी अस्पतालों की क्षमता बढ़ाना, निजी इलाज की कीमत को पारदर्शी और नियंत्रित करना और मरीज की जेब से होने वाला खर्च कम करना. हालांकि, संसदीय समिति की सिफारिशें अभी कानून नहीं हैं. इन्हें लागू करने के लिए सरकार को अलग-अलग नियम, संस्थागत व्यवस्था और वित्तीय फैसले लेने होंगे.

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