लड़की की केस में बुरी तरह फंसी भाजपा, 11 जनवरी को सड़कों पर लाखों की हुंकार!
जब किसी देश के सैनिकों का भरोसा डगमगाने लगता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक संकट नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र की सेहत पर गहरा सवाल बन जाता है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या आने वाली 11 तारीख को भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी होने वाली है? क्या सैनिकों ने भी अब सरकाक के खिलाफ सड़कों पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है?
क्या अंकिता भंडारी केस को लेकर भाजपा सरकार बुरी तरह फंस चुकी है? क्या वो VIP सरकार के लिए गले की फांस बन गया है? जब किसी राज्य में इंसाफ पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो उसका असर सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सड़कों, गलियों और लोगों के दिलों में साफ नजर आने लगता है। उत्तराखंड में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल बन गया है। एक पुराना मामला, जिसे खत्म मान लिया गया था, अचानक फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
शांत दिखने वाला पहाड़ी राज्य अब विरोध, सवाल और नाराज़गी की आवाज़ों से गूंज रहा है। तो आने वाली 11 जनवरी को क्या होने जा रहा है? उर्मिला सनावर ने बड़े खुलासे करते हुए कौनसा वीडियो जारी किया है? और कैसे अंकिता भंडारी मामले में भाजपा सरकार बुरी तरह से फंस गई है?
जब किसी देश के सैनिकों का भरोसा डगमगाने लगता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक संकट नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र की सेहत पर गहरा सवाल बन जाता है। और जब वही सैनिक, जिन्होंने सीमा पर देश की रक्षा की, सड़क पर उतरकर न्याय की गुहार लगाने लगें, तो समझ लीजिए कि मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि इंसाफ की आत्मा का हो जाता है। उत्तराखंड में आज यही हो रहा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर अब पूर्व सैनिक भी खुलकर विरोध में उतर आए हैं।
देहरादून की सड़कों पर सैकड़ों पूर्व सैनिकों का मौन पैदल मार्च सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ एक साइलेंट चार्जशीट था, जिसने एक बेटी को इंसाफ देने के नाम पर सिर्फ सजा सुनाकर अपनी जिम्मेदारी खत्म समझ ली। हाथों में बैनर, आंखों में आंसू और चेहरे पर गुस्सा—इन सैनिकों की बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि मामला अब सिर्फ एक केस नहीं रहा। “उत्तराखंड आज शर्मिंदा है”, “बेटी अंकिता का परिवार हमारा परिवार है”, “हम बेटी अंकिता का परिवार हैं” जैसे नारे इस बात का सबूत हैं कि जनता अब सरकार की कहानी से संतुष्ट नहीं है।
कई पूर्व सैनिक दूर-दराज़ के इलाकों से पैदल चलकर पहुंचे। कोई बैग लेकर, कोई लाठी के सहारे। यह वही लोग हैं जिन्होंने कभी गोली और बर्फ के बीच खड़े होकर देश की रक्षा की थी। आज वही लोग अपने ही राज्य में एक बेटी के लिए न्याय मांग रहे हैं। इस मार्च का नेतृत्व केंद्रीय अध्यक्ष महावीर राणा ने किया और करीब साढ़े ग्यारह बजे परेड ग्राउंड से यह शांतिपूर्ण लेकिन बेहद ताकतवर संदेश देने वाला मार्च शुरू हुआ।
उधर, अंकिता भंडारी के पिता ने साफ ऐलान कर दिया है कि 11 जनवरी को पूरा उत्तराखंड बंद रहेगा। यानी 7, 8, 9 और 10 जनवरी के विरोध के बाद अब 11 तारीख को राज्यव्यापी बंद। यह कोई छोटी बात नहीं है। यह बताता है कि जनता का गुस्सा अब सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे राज्य को रोक देने की ताकत रखता है।
इस बीच उर्मिला सनावर उर्फ उर्मिला सुरेश राठौड़ ने बड़े खुलासे का दावा करते हुए वीडियो जारी किया है। उन्होंने लिखा कि उनके फोन में मौजूद रिकॉर्डिंग, उसकी तारीख और उसमें मौजूद जानकारी सबसे बड़ा सबूत है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके फोन से छेड़छाड़ की कोशिश की जा सकती है, इसलिए उन्होंने वीडियो के जरिए पहले ही सब कुछ सार्वजनिक कर दिया है। उर्मिला का दावा है कि सुरेश राठौर ने उन्हें बताया था कि अंकिता भंडारी की हत्या के पीछे कौन सा वीआईपी नेता है।
अब देखिए यह सब तब हो रहा है जब बीजेपी सरकार लगातार यही कहती रही कि इस केस में “पूरा इंसाफ” मिल चुका है। लेकिन सवाल यह है कि अगर इंसाफ मिल गया था, तो फिर आज सड़कों पर इतना गुस्सा क्यों है? 18 सितंबर 2022 को अंकिता भंडारी की हत्या हुई। छह दिन बाद, 24 सितंबर को उसकी लाश मिली। तीन साल चार महीने की लंबी लड़ाई के बाद, मई 2025 में कोर्ट ने पुलकित आर्य, अंकित गुप्ता और सौरभ भास्कर को उम्रकैद की सजा सुनाई। पुलकित आर्य बीजेपी नेता विनोद आर्य का बेटा है।
सरकार ने इसे बड़ी उपलब्धि की तरह पेश किया। मीडिया में कहा गया कि अब इंसाफ हो गया, मामला खत्म। लेकिन क्या सच में इंसाफ हो गया था? अगर इंसाफ पूरा होता, तो आज उत्तराखंड की सड़कों पर इतनी भीड़ नहीं होती। अगर सच सामने आ चुका होता, तो एक बार फिर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर सब कुछ साफ होता, तो बीजेपी के अपने नेता ही दोबारा जांच की मांग नहीं कर रहे होते।
असल कहानी फिर से 29 दिसंबर को शुरू हुई, जब उर्मिला सनावर नाम की एक महिला ने सोशल मीडिया पर वीडियो डाला। इस वीडियो में उसने दावा किया कि अंकिता की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उसने एक वीवीआईपी नेता को “एक्स्ट्रा सर्विस” देने से इनकार कर दिया था। वह उस रिजॉर्ट में सिर्फ 20 दिन पहले बतौर रिसेप्शनिस्ट काम करने आई थी। इसके बाद उर्मिला ने एक ऑडियो भी जारी किया। इस ऑडियो में कथित तौर पर बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की आवाज है। इसी ऑडियो में वह उर्मिला को बता रहे हैं कि अंकिता की हत्या क्यों और कैसे हुई और उस वीआईपी नेता का नाम भी लेते हैं।
इस खुलासे के बाद पूरा उत्तराखंड फिर से उबल पड़ा। लोग सड़कों पर उतर आए। मांग साफ थी—उस वीआईपी नेता की गिरफ्तारी और मामले की सीबीआई जांच। लेकिन यहां बीजेपी सरकार का असली चेहरा सामने आता है। उस वीआईपी नेता ने सीधे दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट से आदेश ले आया कि उसका नाम मीडिया में नहीं लिया जाएगा। यानी जनता को जानने का हक भी अदालत की एक लाइन में दबा दिया गया। अब सरकार कहती है कि नाम नहीं लिया जा सकता, इसलिए सवाल ही खत्म। लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए हैं। सवाल और तेज हो गए हैं। उर्मिला सनावर खुद को बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की दूसरी पत्नी बताती हैं। उन्होंने जो ऑडियो जारी किया, उसमें उनकी अपनी आवाज के अलावा सुरेश राठौर की आवाज भी है। इसी ऑडियो में वीआईपी एंगल की बात होती है।
इस खुलासे के बाद बीजेपी के भीतर भी खलबली मच गई। कई नेता मुख्यमंत्री धामी से दोबारा जांच की मांग करने लगे। खुद अंकिता के पिता ने भी मुख्यमंत्री से कहा कि नए सबूत सामने आए हैं, इसलिए मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। मुख्यमंत्री दफ्तर के बाहर धरना दिया गया। लेकिन सरकार की तरफ से वही पुरानी रट—सब कुछ जांचा जा चुका है, सबूत नहीं मिले, केस खत्म। तीन साल पहले बनी एसआईटी के एक सदस्य, हरिद्वार ग्रामीण एसपी शेखर सुयैल ने कहा कि तब भी वीआईपी एंगल की जांच की गई थी, लेकिन कोई सबूत नहीं मिला। सवाल यह है कि अगर सबूत नहीं मिला था, तो अब सामने आए ऑडियो और वीडियो क्या हैं? क्या ये सिर्फ “अफवाह” हैं या सरकार इन्हें इसलिए नकार रही है क्योंकि नाम किसी ताकतवर से जुड़ा है?
लोगों के दबाव में सरकार को मजबूरन फिर से एसआईटी बनानी पड़ी। इस नई एसआईटी ने उर्मिला सनावर से लंबी पूछताछ की। पहले सरकार और पुलिस कह रही थीं कि उर्मिला गायब हैं। लेकिन बाद में वही उर्मिला खुद एसआईटी के सामने पहुंच गईं। उर्मिला ने 5 जनवरी 2026 को सोशल मीडिया पर लिखा कि नया खुलासा 1 नवंबर 2025 को हुआ था। उसी दिन उन्होंने ऑडियो रिकॉर्ड किया था। उन्होंने यह भी जताया कि उनके फोन के साथ कुछ भी हो सकता है, इसलिए उन्होंने पहले ही सबूत सार्वजनिक कर दिए हैं।
अब मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की सफाई सुनिए। उन्होंने कहा कि जिस वीआईपी नेता का नाम सामने आ रहा है, वह 10 से 20 सितंबर के बीच उत्तराखंड में था ही नहीं। यानी सरकार का पूरा बचाव सिर्फ तारीखों पर टिका हुआ है। न कोई जांच रिपोर्ट, न कोई ठोस सबूत, बस एक बयान। लेकिन सवाल यह है कि अगर वह नेता उत्तराखंड में नहीं था, तो सरकार इतनी घबराई हुई क्यों है? बार-बार प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों हो रही हैं? नाम लेने पर रोक क्यों लगवाई गई? अगर सब कुछ साफ होता, तो सरकार को चुप रहने देना ही काफी था।
सच्चाई यह है कि बीजेपी सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जनता अब सिर्फ सजा से संतुष्ट नहीं है, वह पूरी सच्चाई चाहती है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या सच में तीन आरोपी ही पूरे मामले के जिम्मेदार थे या किसी ताकतवर वीआईपी को बचाने के लिए कहानी अधूरी छोड़ दी गई। यह मामला सिर्फ अंकिता भंडारी का नहीं रहा। यह उस सिस्टम का आईना बन गया है, जहां रसूखदार नामों पर परदा डाल दिया जाता है और आम लोगों को “इंसाफ हो गया” कहकर चुप करा दिया जाता है।
पूर्व सैनिकों का सड़क पर उतरना, पिता का उत्तराखंड बंद का ऐलान करना, बीजेपी नेताओं का अपनी ही सरकार से सवाल पूछना—ये सब इस बात का सबूत हैं कि जनता को सरकार की कहानी पर भरोसा नहीं है।बीजेपी सरकार बार-बार कह रही है कि कानून ने अपना काम कर दिया। लेकिन जनता कह रही है कि सच्चाई अभी बाहर नहीं आई है।



