फैसले का इंतजार करते दलबदल के मामले, 21 सांसदों पर अब तक नहीं आया निर्णय

दलबदल विरोधी कानून में अयोग्यता का प्रावधान है, लेकिन स्पीकर के फैसले की समय-सीमा तय नहीं है. 21 सांसदों के मामले ने फिर सवाल उठाया है कि फैसले में देरी कब तक चलेगी.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दलबदल विरोधी कानून में अयोग्यता का प्रावधान है, लेकिन स्पीकर के फैसले की समय-सीमा तय नहीं है. 21 सांसदों के मामले ने फिर सवाल उठाया है कि फैसले में देरी कब तक चलेगी.

भारत में सांसद या विधायक पार्टी बदलते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत होती है. अब 20 TMC सांसदों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.

TMC महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने 24 अगस्त 2026 को याचिका दाखिल कर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को इन सांसदों की अयोग्यता पर जल्द फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की. CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ 25 अगस्त को मामले की सुनवाई करेगी.

इन 20 सांसदों ने TMC से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जाने का दावा किया है. TMC ने इनके खिलाफ स्पीकर के सामने अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की हैं. अभिषेक बनर्जी ने 19 जून को मामला उठाया, 27 जुलाई को रिमाइंडर भेजा और 12 अगस्त को स्पीकर से मुलाकात की.

TMC का आरोप है कि सांसदों ने पार्टी छोड़कर दूसरी राजनीतिक पहचान अपनाई है. वहीं, सांसद खुद को NCPI का अलग समूह बताते हैं. अब सवाल है कि उनका कदम दलबदल माना जाएगा या नहीं. फैसला स्पीकर को करना है.

TMC के 20 सांसदों के अलावा 2021 से 2026 तक यानी 5 साल में 8 ऐसे मामले रहे हैं, जिन पर स्पीकर ने कोई फैसला नहीं लिया. इनमें से 7 मामले 2021 और 2023 के थे, जिन पर 2024 यानी लोकसभा के भंग होने तक कोई फैसला नहीं हो पाया. फिलहाल TMC के 20 सांसदों समेत 21 मामले पेंडिंग हैं.

TMC के अलावा किस पार्टी से जुड़ा है एक मामला

मौजूदा लोकसभा में एक और अयोग्यता मामला पेंडिंग है. 19 मार्च 2026 को JD(U) सांसद दिलेश्वर कामैत ने बांका सांसद गिरिधारी यादव के खिलाफ याचिका दाखिल की थी. JD(U) का आरोप है कि यादव ने पार्टी के खिलाफ काम किया और बिहार के बेलहर विधानसभा चुनाव में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय अपने बेटे (RJD उम्मीदवार) का समर्थन किया.

यह मामला भी लोकसभा स्पीकर के सामने पेंडिंग है. इस तरह मौजूदा लोकसभा में 20 TMC सांसदों और 1 JD(U) सांसद यानी कुल 21 सांसदों से जुड़े अयोग्यता विवाद सामने हैं.

2021 के मामले में तीन साल तक नहीं हुआ फैसला

यह पहली बार नहीं है जब लोकसभा में अयोग्यता याचिकाएं लंबे समय तक पेंडिंग रही हैं. 2021 में TMC के शिशिर अधिकारी और सुनील कुमार मंडल और YSRCP के के. रघुराम कृष्ण राजू के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी. लोकसभा सचिवालय ने जुलाई 2021 में इन तीनों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.

पिछली लोकसभा में अयोग्यता याचिकाएं करीब तीन साल तक लंबित रहीं और 2024 में लोकसभा भंग होने के साथ बिना अंतिम फैसले के खत्म हो गईं. यानी जिस कार्रवाई का फैसला मौजूदा लोकसभा के दौरान हो सकता था, वह सदन का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही निष्प्रभावी हो गई.

यही इस कानून की सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी है. कानून में दलबदल के आधार पर अयोग्यता का प्रावधान है, लेकिन स्पीकर के फैसले की स्पष्ट संवैधानिक समयसीमा नहीं है.

2023 में NCP का मामला भी अटका

2023 में NCP में फूट के बाद भी लोकसभा में इसी तरह का विवाद सामने आया. शरद पवार गुट ने सुनील तटकरे की सदस्यता खत्म करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष के सामने याचिका दाखिल की. जुलाई 2023 में याचिका दाखिल होने के चार महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. नवंबर में सुप्रिया सुले ने स्पीकर को पत्र लिखकर जल्द फैसला लेने की मांग की.

तटकरे की ओर से भी सुप्रिया सुले और कुछ अन्य सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दाखिल करने की बात कही गई थी. इससे एक और समस्या सामने आती है, जब दोनों गुट एक-दूसरे के खिलाफ अयोग्यता याचिका दाखिल करते हैं, तो मामला राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर जटिल हो जाता है.

क्या स्पीकर के पास कोई समय-सीमा नहीं?

दलबदल विरोधी कानून में यह तय है कि किसी सांसद या विधायक को दलबदल के आधार पर अयोग्य ठहराने का फैसला संबंधित सदन के स्पीकर या चेयरमैन करते हैं. लेकिन कानून में यह नहीं लिखा है कि उन्हें कितने दिनों या महीनों में फैसला करना ही होगा.

यही वजह है कि कई मामलों में शिकायत, नोटिस, जवाब, सुनवाई और रिपोर्ट की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रहती है. 2021 के मामलों में याचिकाएं प्रिविलेज कमेटी को भेजी गई थीं, लेकिन अंतिम रिपोर्ट नहीं आई और स्पीकर का फैसला भी नहीं हुआ. 2024 में लोकसभा भंग होने के बाद ये मामले खत्म हो गए.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?

सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह कह चुका है कि दलबदल से जुड़े मामलों में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं होनी चाहिए. 2020 में मणिपुर के विधायक केशम मेघचंद्र सिंह मामले में अदालत ने कहा था कि स्पीकर को उचित समय में फैसला करना चाहिए और सामान्य तौर पर तीन महीने की अवधि को उचित माना जा सकता है, हालांकि परिस्थितियों के अनुसार समय अलग हो सकता है. लेकिन यहां एक अहम बात है.

सुप्रीम कोर्ट खुद स्पीकर की जगह बैठकर हर दलबदल मामले का फैसला नहीं करता. अदालत जरूरत पड़ने पर स्पीकर को समयबद्ध तरीके से फैसला करने के लिए कह सकती है और स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा भी हो सकती है.

2017 में राज्यसभा ने दिखाया था तेज फैसला

दलबदल के मामलों में तेजी का एक उदाहरण राज्यसभा से मिलता है. 2017 में शरद यादव और अली अनवर के खिलाफ JD(U) ने अयोग्यता याचिका दाखिल की थी. तत्कालीन राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू ने दोनों को दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित किया. याचिकाएं 2 सितंबर 2017 को दाखिल हुई थीं और दिसंबर में फैसला सुनाया गया. 93 दिन के भीतर दोनों सांसदों की सदस्यता चली गई थी.

पहले भी सांसदों की सदस्यता गई है

दलबदल विरोधी कानून 1985 में संविधान की 52वीं संशोधन के जरिए लागू हुआ और दसवीं अनुसूची जोड़ी गई. इसका मकसद सांसदों और विधायकों के बार-बार पार्टी बदलने पर रोक लगाना था. लोकसभा में सदस्यता खत्म करने के पुराने उदाहरण भी हैं. संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक 2008 में कुलदीप बिश्नोई, जय प्रकाश और एसपी सिंह बघेल को अलग-अलग तारीखों पर दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया गया था.

कानून मजबूत है या फैसला लेने की व्यवस्था?

दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य साफ है. जनता के वोट से चुना गया सांसद पार्टी बदलकर अपनी सीट न बचा सके. लेकिन मौजूदा विवाद दिखाता है कि कानून होने के बावजूद उसके अमल में देरी बड़ी समस्या बन सकती है.

अगर फैसला चुनाव या लोकसभा के कार्यकाल खत्म होने तक टल जाए, तो अयोग्यता का पूरा उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है. यही वजह है ताजा मामले ने पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है, क्या दलबदल मामलों में स्पीकर के फैसले के लिए निश्चित समय सीमा तय होनी चाहिए?

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