Gen Z से क्यों घबराईं राजनीतिक पार्टियां? 2029 में कितना बड़ा होगा युवा फैक्टर

Gen Z पीढ़ी के आंदोलन के जरिए बरसों से खुद में जोश फूंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष में भी इस जेनरेशन के जरिए गजब का उत्साह आया. क्योंकि सदियों से इस देश ने युवा के नाम पर अधेड़ नेताओं को ही देखा था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: Gen Z पीढ़ी के आंदोलन के जरिए बरसों से खुद में जोश फूंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष में भी इस जेनरेशन के जरिए गजब का उत्साह आया. क्योंकि सदियों से इस देश ने युवा के नाम पर अधेड़ नेताओं को ही देखा था.

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) दिल्ली में अगले महीने 5 सितंबर को एक बार फिर मार्च निकालने की बात कह रही हैं. जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद बिहार और झारखंड समेत कई जगह जेन जी ने तरह-तरह के विरोध प्रदर्शन किए. लेकिन उस पर सरकार और विपक्ष ने जिस तरह का रूख अपनाया और अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की, गालियां भी सुनी और नखरें भी उठाए. अब सवाल उठता है कि जेन जी क्या वाकई इतनी चैलेंजिंग हैं कि वे चुनाव ही पलट देंगे.

पेपर लीक, आउट ऑफ सिलेबस प्रजाति

बनिया बनिये को वोट देगा, दलित दलित को, ब्राह्मण ब्राह्मण को, मुसलमान मुसलमान को हिंदुस्तान की पारंपरिक वोट व्यवस्था को सीधे-सीधे हिंदू-मुसलमान वाले समीकरण में आंका ही जा रहा था कि आउट ऑफ सिलेबस आई एक प्रजाति ने कोहराम मचा दिया.

कोहराम भी ऐसा-वैसा नहीं, महज 2 किलोमीटर के दायरे से एक मंत्री का इस्तीफा खींच लाया. बरसों से खुद में जोश फूंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष में भी इस जेनरेशन के जरिए गजब का उत्साह आया. क्योंकि सदियों से इस देश ने युवा के नाम पर अधेड़ नेताओं को ही देखा था. जब असली वाले, 30 की उम्र से कम के युवा एक मुद्दे पर इकठ्ठा होकर सड़क पर आएं तो पार्टियों को समझ आया कि ये माल तो कमाल का है.

बस, तब से चुनाव साधने के लिए जेन-जी को साधने की हर पार्टी की कोशिश शुरू हो गई. समाजवादी पार्टी (सपा)- बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस तक, यहां तक कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी जेन-जी से संवाद कर रहे हैं. लेकिन सवाल है कि क्या जेन-जी चुनाव नतीजों पर इतना असर डाल सकती है कि पार्टियां अब सब भूलकर इनके नखरे उठाने को आमादा हैं?

क्या कयामत है जेन जी

जेन-जी यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी. मौजूदा समय में इसकी उम्र करीब 14 से 29 साल के बीच है. भारत में 15 से 29 साल के युवाओं की आबादी करीब 37 से 41 करोड़ के बीच है और दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भारत में है. अनुमान है कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक जेन-जी की आबादी करीब 38 करोड़ हो सकती है. यानी हर चौथा वोट, और कुछ अनुमानों के मुताबिक हर तीसरा वोट, इसी पीढ़ी का हो सकता है.

पहले भी होते रहे युवा आंदोलन

लेकिन युवाओं का चुनावी असर की कोई नई कहानी नहीं है. 1974 में गुजरात में हॉस्टल मेस की फीस बढ़ने और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ नव निर्माण आंदोलन सरकार तक पहुंचा और मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा.

फिर 1974-75 में बिहार का छात्र आंदोलन जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशव्यापी आंदोलन बना. इमरजेंसी में कई छात्र नेता जेल गए और 1977 में इंदिरा गांधी सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा. इसी तरह 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद देश के विश्वविद्यालयों में आरक्षण के पक्ष और विरोध में बड़े युवा आंदोलन हुए. इसका असर सिर्फ उस दौर की राजनीति पर नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ा.

साल 2011 का अन्ना आंदोलन हो या 2012 का निर्भया आंदोलन… युवा फिर सड़कों पर था. जनलोकपाल की मांग ने आगे चलकर आम आदमी पार्टी की राजनीति को जन्म दिया, जबकि निर्भया आंदोलन के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशें आईं और आपराधिक कानून में बड़े बदलाव हुए.

2015-16 में एफटीआईआई के अध्यक्ष के रूप में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ छात्रों का आंदोलन 139 दिन चला. इसी दौर में रोहित वेमुला की मौत के बाद हैदराबाद विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध ने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव और संस्थागत जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी.

क्या कहते हैं चुनावी एक्सपर्ट

चुनाव में कितना असर पड़ेगा, सी वोटर के फाउंडर यशवंत देशमुख कहते हैं, “अब नाम भले जेन-जी है, लेकिन युवा आंदोलनों का चुनावी असर नया नहीं है. हर चुनाव के बीच करीब 7-8 प्रतिशत नए वोटर्स जुड़ते हैं और लगभग इतने ही पुराने वोटर्स हटते हैं. नए मतदाताओं का कुल चुनावी असर करीब 10 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. 2029 में 25 से 30 प्रतिशत वोट जेन-जी के हो सकते हैं. और जेन-जी की एक खासियत है. ये सिर्फ ये याद नहीं रखती कि सरकार ने क्या किया. वे ये भी याद रख सकती है कि सरकार ने क्या नहीं किया?”

क्या पिता पुत्र के वोट बंटेंगे? इस पर भी चुनाव विश्लेषक यंशवंत देशमुख कहते हैं, “एक परिवार में अलग-अलग वोट पड़ना भी अब नई बात नहीं रह गई है. पिछले कुछ सालों में महिला मतदाताओं ने इसे और स्पष्ट किया है. अब अगर युवा भी परिवार की पारंपरिक पसंद से अलग वोट करता है, तो लोकतंत्र के लिए यह कोई खतरा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के और ज्यादा व्यक्तिगत होने का संकेत है.”

क्या सोचकर वोट देगा जेन जी, एक्सपर्ट कहते हैं क्योंकि अगर किसी राज्य या केंद्र में कोई सत्ता 15 साल तक बनी रहती है, तो जेन-जी के लिए वो सत्ता सिर्फ इतिहास नहीं होती, वही उसकी पूरी राजनीतिक स्मृति होती है. उसने बचपन से वही सत्ता देखी है. उसके पास तुलना के लिए कोई रिफरेंस नहीं होता है. पिछली पीढ़ी के अनुभव से उसे बहुत ज्यादा वास्ता नहीं होता.

इसलिए 2029 के चुनावी गणित में जेन जी का वोट भले ही करीब 25-30 पर्सेंट हो, लेकिन वाइब 100 फीसदी होगी.

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