हाइकोर्ट ने पुलिस को फटकारा, BJP सरकार के बड़े-बड़े दावों की खुली पोल
उत्तर प्रदेश की ठांए-ठांए वाली पुलिस के कारनामे तो किसी से छिपे नहीं है। वहीं ठांए-ठांए वाली पुलिस अपराधियों की धड़पकड़ के दौरान हाफ एनकाउंटर करके जो शेखी बगारती है उससे तो हर कोई वाकिफ है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या आप जानते हैं कि आज के भारत में, जिसे विश्व गुरु कहकर ढिंढोरा पीटा जाता है, वहां ऐसा अमृतकाल आ गया है जहां पुलिस जज के दबाव में नहीं, बल्कि जज पुलिस के दबान में आ चुके हैं।
ये बात हम खुद से नहीं कह रहे, बल्कि ये बात तो खुद कोर्ट रूम में जज के मुंह से सुनने को मिली है। चारों तरफ शोर मचा हुआ है कि उत्तर प्रदेश में रामराज्य चल रहा है। गुंडे-बदमाश-माफिया डर के मारे कांप रहे हैं, भाग रहे हैं। लेकिन हकीकत का पर्दा अब उठ चुका है। योगी आदित्यनाथ की सरकार में पुलिस जिस तरह बेलगाम हो गई है, वो अब कोर्ट के सामने खुलकर सामने आ गया है। दरअसल, हाल ही में एक केस के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस को ऐसी खरी-खरी सुनाई है कि वो शायद पूरी जिंदगी याद रखेगी। हाइकोर्ट ने न सिर्फ पुलिस के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं बल्कि उसके लिए ऐसी गाइडलाइन भी जारी कर दी है जिसे पुलिस को हर हाल में मानना पड़ेगा। तो यूपी पुलिस के ‘हाफ एनकाउंटर’ तरीके पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए क्या टिप्पणी की है और आखिर क्यों जज को ये कहना पड़ा कि पुलिस जजों पर दबाव बना रही है।
उत्तर प्रदेश की ठांए-ठांए वाली पुलिस के कारनामे तो किसी से छिपे नहीं है। वहीं ठांए-ठांए वाली पुलिस अपराधियों की धड़पकड़ के दौरान हाफ एनकाउंटर करके जो शेखी बगारती है उससे तो हर कोई वाकिफ है। लेकिन अब यूपी पुलिस के हाफ एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए तगड़ी फटकार लगा दी है। हाईकोर्ट ने बहुत साफ और सख्त लहजे में कहा कि पुलिस अब सिर्फ तारीफ लेने, जल्दी-जल्दी प्रमोशन पाने और सोशल मीडिया पर लाइक्स-शेयर की वाहवाही बटोरने के लिए बेवजह गोलियां चला रही है। जज ने कहा कि पुलिस को ये भ्रम हो गया है कि गोली चलाकर वो इनाम ले लेगी, शाबाशी ले लेगी, और ऊपर वाले खुश हो जाएँगे।
कोर्ट ने याद दिलाया कि कानून सबसे बड़ा है। कोई भी इंसान, कोई भी अफसर, कोई भी सरकार कानून से ऊपर नहीं हो सकती। ये पूरी बात मिर्जापुर के एक शख्स राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य लोगों की जमानत याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान सामने आई। ये तीनों अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ में घायल हुए थे। कोर्ट ने ध्यान से देखा कि इन तीनों घटनाओं में एक भी पुलिसवाले को चोट नहीं आई। अगर पुलिस को चोट नहीं लगी, तो गोली चलाने की क्या जरूरत पड़ गई? ये सवाल कोर्ट ने खुद उठाया। पुलिस का दावा था कि मुठभेड़ हुई, लेकिन सबूत कहां हैं? सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि हां, मुठभेड़ की एफआईआर तो दर्ज कर ली गई थी। लेकिन घायल का बयान न तो किसी मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया और न ही किसी डॉक्टर या मेडिकल अफसर के सामने। कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के साफ नियमों का खुला उल्लंघन करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर के लिए बहुत सख्त गाइडलाइन बनाई हैं। उनमें ये जरूरी है कि घायल का बयान तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने हो, मेडिकल जांच हो, और सब कुछ पारदर्शी तरीके से हो। लेकिन यूपी पुलिस इन नियमों को ठेंगा दिखा रही है। इसी को देखते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने 6 पॉइंट की नई और सख्त गाइडलाइन जारी की है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर आगे से पुलिस सुप्रीम कोर्ट के एनकाउंटर नियमों का पालन नहीं करेगी, तो जिले के एसपी, एसएसपी और पुलिस कमिश्नर खुद कोर्ट की अवमानना के दोषी ठहराए जाएँगे। उनका नाम लेकर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी। मतलब अब कोई ये नहीं कह सकेगा कि “ऊपर से आदेश था” या “मैं तो सिर्फ आदेश का पालन कर रहा था”। अफसरों को अब अपनी कुर्सी और नौकरी का डर होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने एक और भी गंभीर बात कही। उसने कहा कि आरोपियों के पैरों में गोली मारकर बाद में उसे मुठभेड़ बता देना अब एक फैशन बन गया है। ये रोज-रोज की बात हो गई है।
या तो बड़े अफसरों को खुश करने के लिए, या आरोपी को “सबक सिखाने” के बहाने। कोर्ट ने डीजीपी राजीव कृष्णा और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय प्रसाद से सीधे सवाल किया कि क्या पुलिस को पैरों में गोली मारने का कोई मौखिक या लिखित आदेश दिया गया है? क्या ऊपर से ऐसा कोई इशारा है कि “पैरों में मारो, मुठभेड़ दिखाओ”? कोर्ट ने ये भी बताया कि छोटे-छोटे, मामूली अपराधों में भी पुलिस बिना सोचे-समझे गोली चला देती है और फिर उसे मुठभेड़ का नाम दे देती है। जज ने कहा कि सजा देने का हक सिर्फ कोर्ट का है। पुलिस को ये हक नहीं है कि वो खुद जज बन जाए और सजा सुना दे। अगर पुलिस कोर्ट के क्षेत्र में दखल देगी, तो ये लोकतंत्र के खिलाफ जाएगा। भारत कानून के राज वाला देश है, पुलिस राज वाला नहीं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस देशवाल ने राज्य सरकार के वकील से बहुत सख्त लहजे में कहा – “देखिए, हम यूपी को पुलिस स्टेट नहीं बनने देना।” ये शब्द बहुत भारी हैं। मतलब कोर्ट को साफ लग रहा है कि उत्तर प्रदेश धीरे-धीरे पुलिस राज्य की तरफ बढ़ रहा है। जज ने ये भी कहा कि अब हर जिले में कानून का पालन नहीं हो रहा। उन्हें ऐसा एक भी केस नहीं मिला जहां सुप्रीम कोर्ट के एनकाउंटर नियम पूरी तरह फॉलो किए गए हों। इसका मतलब साफ है कि जो हमें सोशल मीडिया पर या गोदी मीडिया पर दिखाया जाता है कि यूपी में कानून का बोलबाला है उसकी सच्चाई ये है। योगी जी की पुलिस सड़कों पर अन्याय करती है और योगी जी कानून प्रशासन के नाम पर अपनी पीठ थपथपाते हैं।
इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने एक और बहुत चिंताजनक बात बताई। हाइकोर्ट का कहना था कि पुलिस के जवान अफसर अब जजों पर दबाव डालते हैं कि फैसला उनके पक्ष में आए। कई जगहों पर पुलिस और जजों के बीच खुला झगड़ा हो जाता है। जज ने एक उदाहरण भी दिया। जस्टिस अरुण कुमार ने कहा कि एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का तबादला सिर्फ इसलिए करना पड़ा क्योंकि पुलिस और कोर्ट के बीच ये खींचतान बहुत बढ़ गई थी। जज ने कहा कि ये समस्या सिर्फ एक जिले की नहीं है। पूरे राज्य के जिला जजों से जानकारी मिली है कि ज्यादातर जगहों पर आईपीएस अफसर जजों पर दबाव डालते हैं।
अगर फैसला पुलिस के खिलाफ जाता है, तो तुरंत दबाव शुरू हो जाता है। बार एसोसिएशन के नेताओं ने भी कोर्ट को बताया कि कई बार बड़े पुलिस अफसर कोर्ट में घुसकर केस को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। जज ने साफ कहा कि पुलिस को खुद को जज से बड़ा नहीं समझना चाहिए। आपसी सम्मान बहुत जरूरी है। अगर पुलिस जजों को धमकाएगी, दबाव डालेगी, तो आखिरकार इसका नुकसान आम आदमी को होगा। गरीब, बेबस लोग तो पहले से ही पुलिस के डर में जीते हैं। अगर कोर्ट भी सुरक्षित नहीं रहा, तो न्याय कहां से मिलेगा?
ये पूरी घटना योगी सरकार के उस बड़े-बड़े दावे की पोल खोल रही है जो कहती है कि पुलिस अब अपराधियों को सबक सिखा रही है। गुंडे भाग रहे हैं। लेकिन हकीकत ये है कि पुलिस प्रमोशन की भूख में, सोशल मीडिया की चमक में, और ऊपर वालों की खुशामद में पैरों में गोली मारकर “ऑपरेशन लंगड़ा” जैसी शर्मनाक हरकतें कर रही है। ये कोई न्याय नहीं, ये तो बदले की कार्रवाई है। हाईकोर्ट ने जो 6 पॉइंट गाइडलाइन जारी की है और जो व्यक्तिगत जिम्मेदारी की चेतावनी दी है, वो अब योगी की पुलिस के लिए एक बड़ा आईना है। या तो नियम मान लो, पारदर्शिता लाओ, कानून का पालन करो। या फिर कोर्ट की अवमानना के चक्कर में फंस जाओ। वरना ये अमृतकाल धीरे-धीरे पुलिस राज में बदल जाएगा। जहां गोली ही इंसाफ बन जाएगी। जहां जज डरेंगे और आम आदमी तो और ज्यादा डरेगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि रामराज का ये नाटक अब नहीं चलेगा। कानून सबके लिए बराबर है। चाहे वो कोई आम नागरिक हो, चाहे कोई बड़ा अपराधी हो, या चाहे वो पुलिस का कोई बड़ा अफसर हो। अगर पुलिस खुद कानून तोड़ रही है, तो वो अपराधी से अलग क्या है?
सुनवाई सिर्फ तीन लोगों की जमानत की नहीं थी। ये पूरे यूपी की पुलिस व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल था। ये योगी सरकार की उस नीति पर सवाल था जो पुलिस को एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनाने पर तुली है। अब कोर्ट ने कह दिया है कि बस बहुत हुआ। अब सुधारो, वरना जवाबदेही तय होगी। और सच कहें तो ये फटकार सिर्फ पुलिस के लिए नहीं है। ये सरकार के लिए भी है। क्योंकि पुलिस जितनी बेलगाम है उसमें सरकार की मौन सहमति है। सोचिये जब मुख्यमंत्री खुद सदन में ‘ठोक दो.. मार दो’ जैसी भाषा बोलेंगे तो पुलिस अफसर तो बेलगाम हो ही जाएंगे। लेकिन अब कोर्ट की ये टिप्पणी इतनी सख्त थी कि पुलिस के जमीर को झकझोर कर रख दे लेकिन बेलगाम पुलिस का जमीर जिंदा भी है कि नहीं ये कह पाना थोड़ा मुश्किल है।



