Holi 2026: नवाबी ठाठ में रंगों की बौछार, भोपाल की मशहूर बेगम वाली होली

भोपाल में नवाबों और बेगमों के शासनकाल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि शाही ठाठ, सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक थी.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भोपाल में नवाबों और बेगमों के शासनकाल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि शाही ठाठ, सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक थी. हालांकि, आज के समय में यह स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है.

भोपाल पर नवाबों और बेगमों का लंबे समय तक शासन रहा. यही वजह है कि यहां के त्योहारों में शाही ठाठ और तहजीब की झलक साफ दिखाई देती थी. नवाबी के दौर में होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि मेल-मिलाप, परंपरा और सामाजिक समरसता का उत्सव हुआ करती थी. नवाबों के समय होली का आयोजन दो चरणों में होता था. सुबह शाही परिवार की ओर से ‘एट होम’ रखा जाता था, जहां अधिकारी, जागीरदार, धर्मगुरु और गणमान्य लोग शामिल होते थे.

यह आयोजन अहमदाबाद पैलेस में होता था. यहां प्राकृतिक गुलाल से होली खेली जाती थी और नवाब स्वयं मेहमानों को रंग लगाकर शुभकामनाएं देते थे. शाम को सदर मंजिल में होली दरबार सजता था. यहां भी रंग-गुलाल और आपसी सद्भाव का माहौल रहता था. यह सिलसिला रंगपंचमी तक चलता था. शाहजहां बेगम के समय से शाही परिवार में होली की परंपरा व्यवस्थित रूप में शुरू हुई. हालांकि, बेगमों के कार्यकाल में आयोजन की शैली थोड़ी अलग थी.

फूलों से तैयार किए जाते थे रंग

बेगमें पर्दे में रहती थी ओर दरबार में सीमित मेहमान बुलाए जाते थे और रंगों का खुला प्रदर्शन कम होता था. बेगमों के समय ‘परी बाजार’ में खास आयोजन होता था. उस समय रासायनिक रंगों का चलन नहीं था. टेसू (पलाश) के फूलों से रंग तैयार किया जाता था. समितियां घर-घर जाकर लोगों को प्राकृतिक रंग वितरित करती थीं. धुलेंडी के दिन भक्त प्रह्लाद की झांकी निकाली जाती और हिरण्यकश्यप का पुतला दहन किया जाता था.

बाटी सेंकने की थी परंपरा

नवाबी शासन में त्योहारों के साथ सामाजिक सरोकार भी जुड़े थे. होली पर कर्मचारियों और जागीरदारों को मिठाइयां भेजी जाती थीं. गरीबों के लिए बैत-उल-माल की व्यवस्था के तहत मुफ्त मिठाई और कपड़े बांटे किए जाते थे. होलिका दहन के बाद अंगारों में बाटी सेंकने की परंपरा थी. मान्यता थी कि इसे खाने से पूरे साल समृद्धि बनी रहती है.

कई परिवार होली की पवित्र अग्नि घर भी ले जाते थे. इतिहासकार एसएम हुसैन बताते हैं कि शाहजहां बेगम हुकूमत कर रहीं थी, तब ताजमहल की बिल्डिंग बनकर तैयार हुई थी इसका जश्न मनाया गया और फिर होली का त्यौहार आया तो होली ऐसी मनी की इस होली को भारत की सबसे बड़ी होली माना गया.

चांदी के कटारों में दिया गया था रंग

इस होली के कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों को चांदी की डोरिया से बने हार पहना कर स्वागत किया था. शहर के आम लोगों को गिफ्ट में चांदी के कटारों में रंग दिया गया था. इतना ही नहीं, शहर के प्रतिष्ठित लोगों को सोने की पिचकारी भेंट की गई थी. हुसैन बताते हैं कि ताजमहल में एक बिल्डिंग है जिसका नाम सावन भादो है. उसकी छत पर फूलों से बने रंग ओर उसमें केस सहित अलग-अलग चीजें मिलाकर पूरी छत पर फैलाए गए थे.

अवध नारायण बिसारिया

छत में ऐसे छेद थे जो नीचे से गुजरता उसपर रंग बरसता रहता. खुशबू ऐसी आती थी कि पूरा ताजमहल महकता था. पूरे नवाबी काल में होली के हर कार्यक्रम की पूरी जिम्मेदारी अवध नारायण बिसारिया संभालते थे. राजा अवध नारायण बिसारिया, भोपाल रियासत के इतिहास में एक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं. बिसारिया रियासत के अंतिम शासक नवाब हमीदुल्ला खान के खास दोस्त थे, जो भोपाल रियासत के प्रधानमंत्री रहे और साथ ही भोपाल स्टेट काउंसिल के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी संभाली.

नवाबों और बेगमों के समय की होली में शाही गरिमा,अनुशासन और सांस्कृतिक रंग दिखाई देते थे. आज त्योहार का रूप अधिक आधुनिक हो गया है. फिर भी, पुराने भोपाल की होली इतिहास के पन्नों में आज भी शाही अंदाज और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बनकर दर्ज है.

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