वोटर लिस्ट से बाहर हुए तो क्या अब कभी वोट नहीं दे पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट ने साफ की पूरी बात

पश्चिम बंगाल के SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बयान दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी का नाम मतदाता सूची से हट भी जाए और वह इस चुनाव में वोट न दे पाए, तो भी उसका अधिकार खत्म नहीं होता। ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद नाम दोबारा सूची में जोड़ा जा सकता है।

4pm न्यूज नेटवर्क: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार, 1 अप्रैल 2026 को अहम सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है और वह इस चुनाव में वोट नहीं दे पाता, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसका वोट देने का अधिकार हमेशा के लिए खत्म हो गया है। अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति इस फैसले के खिलाफ अपील करता है और ट्रिब्यूनल यह मानता है कि उसका नाम मतदाता सूची में होना चाहिए, तो उसे दोबारा सूची में शामिल किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों को कानूनी रास्ता अपनाने का पूरा अधिकार है। अगर कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल में अपील करता है और वहां से उसके पक्ष में फैसला आता है, तो उसका नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़ा जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि कई बार ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति का नाम पहले सूची में शामिल होता है, लेकिन बाद में किसी कारण से हटा दिया जाता है। ऐसे मामलों में भी वही नियम लागू होंगे।

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अगली सुनवाई 6 अप्रैल को

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को तय की है। तब तक मतदाता सूची से जुड़ी आपत्तियों और उनकी जांच की प्रक्रिया जारी रहेगी। कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव में वोट न दे पाने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति से उसका संवैधानिक अधिकार हमेशा के लिए छीन लिया गया है।

लाखों आपत्तियों पर चल रही सुनवाई

इस मामले में कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि मतदाता सूची से जुड़े विशेष पुनरीक्षण अभियान के दौरान लगभग 60 लाख आपत्तियां दर्ज हुई थीं। इनमें से करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा 31 मार्च तक किया जा चुका है। अधिकारियों के अनुसार रोजाना लगभग 1.75 लाख से 2 लाख मामलों पर विचार किया जा रहा है और उम्मीद है कि 7 अप्रैल तक सभी आपत्तियों का समाधान कर लिया जाएगा।

अदालत किन दो मुद्दों पर ध्यान दे रही है

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि उन्हें उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की ओर से एक पत्र मिला है, जिसमें पूरी प्रक्रिया से जुड़े आंकड़े साझा किए गए हैं। पीठ ने कहा कि वह खास तौर पर दो बातों पर ध्यान दे रही है।

  • पहला, आगामी चुनाव किस मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएंगे।
  • दूसरा, हर नागरिक का वोट देने का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।

सॉफ्टवेयर सिस्टम पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस सॉफ्टवेयर सिस्टम पर भी चर्चा की, जिसमें मतदाताओं का पूरा विवरण रखा जा रहा है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस प्रणाली का ढांचा ऐसा होना चाहिए जिससे यह साफ पता चल सके कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में क्यों जोड़ा गया या क्यों हटाया गया। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति इस फैसले के खिलाफ अपील करता है तो उसे यह जरूर बताया जाना चाहिए कि उसका नाम किस कारण से सूची से हटाया गया था।

क्यों अहम है यह मामला

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े इस मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें लाखों लोगों के मतदान अधिकार का सवाल जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि अदालत इस पूरे मामले में पारदर्शिता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकार को सबसे ऊपर रख रही है। आने वाली सुनवाई में इस मुद्दे पर और स्पष्ट दिशा मिल सकती है।

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