ईरान-इजराइल तनाव जारी, सीजफायर पर अभी कोई बातचीत नहीं

ईरान ने मान लिया है कि उसे ट्रंप का '15 पॉइंट' वाला प्रपोजल तो मिला है, लेकिन उस पर चर्चा करने की उसकी कोई नीयत नहीं है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या दुनिया का ‘स्वयंभू’ सुपरपावर अब घुटनों पर आ गया है? कल तक जो डोनाल्ड ट्रंप मिडिल ईस्ट को राख करने की धमकियाँ दे रहे थे, आज वही ट्रंप इस्लामी मुल्कों के सामने हाथ जोड़ते दिख रहे हैं।

अंदर की खबर यह है कि ट्रंप ने तुर्किए, मिस्र, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों के जरिए ईरान को मनाने के लिए ‘फोन डिप्लोमेसी’ शुरू कर दी है। ट्रंप चाहते हैं कि किसी भी तरह 5 दिन के युद्धविराम के बाद पूरी तरह से सीज़फायर लागू हो जाए। लेकिन तेहरान का जवाब सुनकर ट्रंप के पैरों तले ज़मीन खिसक गई है।

ईरान ने मान लिया है कि उसे ट्रंप का ’15 पॉइंट’ वाला प्रपोजल तो मिला है, लेकिन उस पर चर्चा करने की उसकी कोई नीयत नहीं है। आज की इस रिपोर्ट में हम उस ‘सीक्रेट डील’ का पर्दाफाश करेंगे जिसे ट्रंप छिपाना चाहते हैं और बताएंगे कि कैसे नेतन्याहू की सनक अब अमेरिका के लिए गले की हड्डी बन गई है।

लॉयड्स लिस्ट’ और ‘एक्सियोस’ की रिपोर्टों के मुताबिक, तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान और मिस्र के अधिकारी इस वक्त वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘डाकिए’ का काम कर रहे हैं। ट्रंप ने पिछले 48 घंटों में कई मुस्लिम देशों के रहनुमाओं को फोन किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने मिस्र के राष्ट्रपति से कहा है कि वे ईरान को समझाएं कि अगर जंग नहीं रुकी, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप को दुनिया की मंदी की फिक्र नहीं है, उन्हें फिक्र है अपनी गिरती साख की और अमेरिका में बढ़ती तेल की कीमतों की।

ट्रंप चाहते हैं कि ईरान कम से कम होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोल दे, लेकिन ईरान ने शर्त रख दी है कि— “पहले इज़राइल को रोको और हर्जाना भरो! फिर आगे बातचीत होगी।”

खबर है कि लगातार कई मुस्लिम देश ईरान को फोन करके जंग रोकने की अपील कर रहे हैं, जिनमें खासतौर से मिस्र, तुर्किए और पाकिस्तान शामिल हैं। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ (AP) की रिपोर्ट के मुताबिक, कई देश तनाव कम करने के लिए सक्रिय हो गए हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान से फोन पर बात की।

हालांकि, यह सार्वजनिक नहीं किया गया है कि तुर्किए दोनों देशों के बीच क्या संदेश पहुँचा रहा है, लेकिन यह साफ हुआ है कि फिदान ने कतर, सऊदी अरब, पाकिस्तान, मिस्र, यूरोपीय संघ और अमेरिकी अधिकारियों से भी बातचीत की है। तुर्किए पहले भी ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है।

मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने कहा कि उन्होंने ईरान को तनाव कम करने के लिए स्पष्ट संदेश भेजे हैं। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने भी बताया कि वह सभी पक्षों के साथ लगातार संपर्क में है। मिस्र के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा है कि ये संदेश ‘ऊर्जा ढाँचों’ पर हमलों को रोकने से संबंधित हैं। खाड़ी देश इस कोशिश में लगे हुए हैं कि किसी तरह यह युद्ध ऊर्जा सुविधाओं की तबाही तक न पहुँचे।

वहीं, ईरान के ऊर्जा मंत्री अब्बास अलीआबादी ने कहा है कि अगर देश के पावर प्लांट्स पर हमला भी होता है, तो लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान ने अपना बिजली उत्पादन सिस्टम अलग-अलग जगहों पर फैला रखा है, इसलिए किसी एक जगह पर हमला होने से पूरी व्यवस्था पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा।

मंत्री ने भरोसा दिलाया कि अगर कोई बिजली घर खराब होता है, तो उसे फौरन ठीक कर लिया जाएगा और पहले से बेहतर बनाया जाएगा। इस तरह की खबरें थीं कि ईरान के पावर प्लांट्स को खत्म करने से पहले अमेरिका ने ’15 पॉइंट’ के फॉर्मूले के साथ 5 दिन की मोहलत दी है। हालांकि, अब ईरान ने मान लिया है कि उसे ट्रंप का प्रस्ताव मिल चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को अमेरिका की ओर से मध्यस्थों के जरिए संदेश मिला है, जिससे कूटनीतिक बातचीत की संभावना बनती दिख रही है। ‘सीबीएस न्यूज़’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अमेरिका ने कुछ अहम प्रस्ताव भेजे हैं जिनकी समीक्षा की जा रही है। उन्होंने कहा, “हमें अमेरिका की ओर से कुछ पॉइंट्स मिले हैं और हम उन पर विचार कर रहे हैं।” इससे संकेत मिलता है कि भारी तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी है।

ईरान की यह बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उसने यह तब कहा है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कहा था कि ईरान के साथ समझौता संभव है। इसकी वजह से विश्व के ऊर्जा बाज़ार प्रभावित हो रहे हैं और दुनिया के कई देश युद्ध का तनाव कम करने की कोशिशों में जुट गए हैं। पहले ईरान ने इनकार किया था कि उसकी अमेरिका से कोई बातचीत हुई है, लेकिन अब उसने माना है कि मध्यस्थों के ज़रिए प्रस्ताव उन तक पहुँचा है।

ऐसे में बड़ा दावा सामने आया है कि जहाँ ट्रंप सुलह की भीख मांग रहे हैं, वहीं ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ रुकने का नाम नहीं ले रही। आज सुबह ही ईरान ने इज़राइल के सैन्य ठिकानों पर ताज़ा मिसाइलें दागी हैं। इज़राइल भी जवाब दे रहा है, लेकिन अब अमेरिका थोड़ा ‘किनारे’ खड़ा हो गया है।

पेंटागन ने 5 दिन के लिए ईरान के ‘पावर ग्रिड’ पर हमले रोकने का आदेश दिया है। इसे ट्रंप ‘शांति की पहल’ कह रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे अमेरिकी सेना की थकान और डर बता रहे हैं। अमेरिका को समझ आ गया है कि अगर ईरान ने अपने असली हथियार निकाल लिए, तो मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी बेस ‘श्मशान’ बन जाएंगे।

इसीलिए, ट्रंप अब खुद गोली चलाने के बजाय तुर्किए और मिस्र के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं। ईरान पहले भी कह चुका है और अब भी कह रहा है कि वह ट्रंप की बातों पर भरोसा बिल्कुल नहीं करता। शायद यही वजह है कि कई मुस्लिम मुल्क फोन करके ईरान को भरोसे में लेने की कोशिश कर रहे हैं कि ट्रंप शायद इस बार सच कह रहे हैं।

जहाँ ट्रंप ने 5 दिन जंग पर ब्रेक लगाया है, वहीं नेतन्याहू लगातार जंग लड़ रहे हैं। जब ट्रंप शांति की बात करते हैं, तो नेतन्याहू तेहरान पर बमबारी तेज़ कर देते हैं। इज़राइल के प्रधानमंत्री को डर है कि अगर जंग रुकी, तो उनकी कुर्सी जाएगी और वे जेल पहुँचेंगे।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ कह दिया है कि बातचीत तब तक बेमानी है, जब तक अमेरिका इज़राइल की ‘किलिंग मशीन’ को फंड देना बंद नहीं करता। ऐसे में ईरान ने साबित कर दिया है कि वह झुकने वाला नहीं है। कतर के एलएनजी प्लांट पर हमले और होर्मुज की नाकेबंदी ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया है।

अब ट्रंप की कोशिश है कि किसी भी तरह ‘फेस सेविंग’ (इज़्ज़त बचाने) का रास्ता मिल जाए। इसीलिए वे मुस्लिम देशों से फोन करवा रहे हैं ताकि ईरान को एक सम्मानजनक ‘एग्जिट’ दिया जा सके। लेकिन मुजतबा खामेनेई के सलाहकारों ने साफ कर दिया है कि— “हमने जंग शुरू नहीं की थी, लेकिन खत्म हम ही करेंगे!”

ऐसे में साफ है कि मिडिल ईस्ट की यह आग अब आसानी से बुझने वाली नहीं है। ट्रंप की कूटनीति फेल हो चुकी है और नेतन्याहू जंग भड़काए रखने के लिए उतावले हैं। हालांकि, ट्रंप के ’15 पॉइंट’ वाले प्रपोजल के जवाब में ईरान ने अपना एक बड़ा प्रपोजल दिया है, जिसमें ट्रंप से नुकसान की भरपाई करने, इज़राइल को मदद न देने, ईरान से प्रतिबंध हटाने और भविष्य में कभी हमला न करने की शर्त रखी गई है। अब मिस्र और तुर्किए इसे मनवाने में कितना कामयाब होते हैं, यह तो आने वाले चार दिनों में तय हो जाएगा।

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