अडानी के मीरजापुर थर्मल प्लांट पर NGT सख्त, केंद्र और यूपी सरकार को नोटिस
मीरजापुर में अडानी की 1600 मेगावाट थर्मल पावर परियोजना को लेकर NGT ने पर्यावरण मंजूरी पर केंद्र, यूपी सरकार और अडानी पावर को नोटिस जारी किया है। ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने फैसले का स्वागत करते हुए जंगल, जल और वन्यजीवों पर खतरे की आशंका जताई है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मीरजापुर के जंगलों और पहाड़ियों के बीच पिछले कई महीनों से एक ऐसी लड़ाई चल रही है, जिसमें एक तरफ देश के बड़े उद्योग समूह की महत्वाकांक्षी परियोजना है, तो दूसरी तरफ अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने की जिद पर अड़े ग्रामीण। अब इस संघर्ष में एक बड़ा मोड़ आया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT ने अडानी पावर की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित मिर्जापुर ताप विद्युत परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए अडानी पावर, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है।
इस फैसले के सामने आने के बाद परियोजना का विरोध कर रहे ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में नई उम्मीद जगी है। उनका कहना है कि वर्षों से उठाए जा रहे सवालों को अब कानूनी मंच पर गंभीरता से सुना जा रहा है।
पर्यावरण मंजूरी को NGT में चुनौती
मामला उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के मड़िहान क्षेत्र से जुड़ा है, जहां अडानी पावर की कंपनी “मिर्जापुर थर्मल एनर्जी यूपी प्राइवेट लिमिटेड” 1600 मेगावाट की कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना स्थापित करना चाहती है। इस परियोजना को 23 सितंबर 2025 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यानी MoEFCC की ओर से पर्यावरण मंजूरी दी गई थी। अब इसी पर्यावरण मंजूरी को NGT में चुनौती दी गई है। ट्रिब्यूनल ने मामले को गंभीर मानते हुए परियोजना कंपनी, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के कई विभागों से जवाब मांगा है।
तीन अलग-अलग मामलों में जारी हुआ नोटिस
NGT के समक्ष इस परियोजना से जुड़े तीन महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं। पहला मामला पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। दूसरा मामला वर्ष 2024 में दायर उस निष्पादन आवेदन का है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि परियोजना कंपनी ने जरूरी अनुमतियां मिलने से पहले ही निर्माण संबंधी गतिविधियां शुरू कर दी थीं। यह मामला पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद समानांतर सुनवाई से बचने के लिए बंद कर दिया गया था, लेकिन अब देश के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने इसे फिर से व्यापक सुनवाई के लिए NGT को भेज दिया है। इसका मतलब है कि पुराने कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों की भी अब दोबारा जांच होगी। तीसरा मामला परियोजना से संबंधित गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग वाली स्थगन याचिका का है। इस मामले में NGT ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
“जंगल और आने वाली पीढ़ियों की लड़ाई”
परियोजना का विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है। विंध्य बचाओ अभियान से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता देवादित्यो सिन्हा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि NGT का आदेश उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो बिना किसी लालच और दबाव के पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात प्रशासन और अदालतों के सामने रखते आए हैं। उनका आरोप है कि परियोजना से जुड़े लोग विकास के नाम पर जंगल, जलस्रोत और वन्यजीवों की कीमत पर औद्योगिक विस्तार करना चाहते हैं।
पर्यावरणीय नुकसान को लेकर बढ़ी चिंता
मड़िहान वन रेंज क्षेत्र विंध्य के जंगलों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस इलाके में बड़े स्तर पर कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना शुरू होती है, तो इसका असर सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसी परियोजनाओं से वायु प्रदूषण, जल स्रोतों पर दबाव और आसपास की कृषि भूमि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र पहले से ही पानी की समस्या और बढ़ते तापमान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में कोयला आधारित परियोजना हालात को और गंभीर बना सकती है।
विकास बनाम पर्यावरण की बहस फिर तेज
मीरजापुर की यह परियोजना अब सिर्फ एक औद्योगिक निवेश का मामला नहीं रह गई है। यह बहस का बड़ा विषय बन चुकी है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक तरफ सरकार और कंपनी इसे रोजगार और बिजली उत्पादन से जोड़कर देख रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग इसे जंगल और जीवन के लिए खतरा मान रहे हैं। NGT की ओर से जारी नोटिस ने साफ संकेत दिया है कि पर्यावरणीय नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब सभी की नजर आगामी सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि परियोजना आगे बढ़ेगी या पर्यावरणीय चिंताओं के चलते उस पर रोक लगेगी। फिलहाल मिर्जापुर के जंगलों में सिर्फ पेड़ों और जमीन की लड़ाई नहीं चल रही, बल्कि यह संघर्ष उस भविष्य को लेकर भी है जिसमें विकास की कीमत प्रकृति से वसूली जा रही है।
रिपोर्ट – संतोष देव गिरी
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