अब उद्धव के सांसदों पर सियासी डाका?
क्या जनादेश बोली लगाकर खरीदा जाएगा

- पश्चिम बंगाल के बाद महाराष्ट्र में भी टूट की आहट
- राज्यसभा की गणित के लिए फिर बदले जाएंगे जनादेश के मायने?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है? जनता का वोट। जनता का भरोसा। जनता का दिया हुआ जनादेश। लेकिन सवाल यह है कि यदि चुनाव के बाद चुने हुए जनप्रतिनिधि ही किसी दूसरे राजनीतिक खेमे में चले जाएं तो फिर वोट जनता ने दिया था या किसी राजनीतिक मंडी ने? महाराष्ट्र की राजनीति में उठ रहा नया तूफान इसी सवाल को एक बार फिर देश के सामने खड़ा कर रहा है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ जो हुआ था अब वही पटकथा महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के लिए लिखी जा रही है? उद्धव ठाकरे के 9 सांसदों में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे खेमे की ओर झुक चुके हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को कुछ ही दिनों के भीतर दूसरी बार दिल्ली में सांसदों की आपात बैठक बुलानी पड़ी है। यह केवल एक बैठक नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक विरासत और अस्तित्व को बचाने की कोशिश दिखाई दे रही है।
सियासी बवंडर सिर्फ शिवसेना यूबीटी का संकट नहीं
महाराष्ट्र में उठ रहा यह सियासी बवंडर सिर्फ शिवसेना (यूबीटी) का संकट नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा एक बड़ा आईना है। आईना जिसमें सवाल सत्ता का नहीं व्यवस्था का है। सवाल किसी एक दल का नहीं लोकतांत्रिक नैतिकता का है। और सवाल सिर्फ इतना है कि क्या जनादेश अब भी जनता का रहता है या फिर चुनाव खत्म होते ही वह राजनीतिक सौदेबाजी की मेज पर रख दिया जाता है?
चल रही है पर्दे के पीछे राजनीतिक इंजीनियरिंग
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है? क्या यह महज वैचारिक असहमति है? क्या सांसद अचानक अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हो गए हैं? या फिर पर्दे के पीछे कोई ऐसी राजनीतिक इंजीनियरिंग चल रही है जिसकी गूंज आने वाले राज्यसभा चुनावों तक सुनाई देगी? विपक्ष के नेता खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि सांसदों को पाला बदलने के लिए भारी भरकम ऑफर दिए जा रहे हैं। आरोपों की सच्चाई जांच का विषय हो सकती है लेकिन सवालों की आग बुझ नहीं रही। लोकतंत्र में दल बदल कोई नया शब्द नहीं है लेकिन अब यह एक राजनीतिक संस्कृति बनती जा रही है। जनता एक दल के नाम पर वोट देती है नेता चुनाव जीतता है और फिर किसी दूसरे झंडे के नीचे पहुंच जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा धोखा किसके साथ होता है? पार्टी के साथ या उस मतदाता के साथ जिसने अपनी उम्मीदों का वोट दिया था? यदि जनादेश चुनाव परिणाम आने के बाद ही बदल जाना है तो फिर चुनावों का अर्थ क्या रह जाता है?
बैठक में नहीं पहुंचे थे सांसद
इससे पहले रविवार को उद्धव ठाकरे ने सांसदों की बैठक बुलाई थी। 9 लोकसभा सदस्यों में से अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजभाऊ वाजे और संजय पाटिल व्यक्तिगत रूप से बैठक में शामिल हुए थे। संजय राउत ने बताया था कि ओमप्रकाश राजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश बापुराव पाटिल अष्टिकर और संजय देशमुख ने ऑनलाइन बैठक में भाग लिया, जबकि संजय जाधव ने फोन पर ठाकरे से बात की। बता दें कि शिवसेना यूबीटी के वर्तमान में 9 सांसद हैं और 19 विधायक हैं। वहीं, 16 जून को शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) के सांसद अरविंद सावंत ने पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के निर्देश पर लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा है। लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र के जरिए पार्टी के कुछ सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता दिए जाने अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय की संभावनाओं पर गंभीर आपत्ति जताई गई है। इसके साथ ही मांग की गई है कि बागी सांसदों को अलग मान्यता न दिया जाए।
पूरा घटनाक्रम राज्यसभा की राजनीतिक से जुड़ा?
वास्तव में यह पूरा घटनाक्रम राज्यसभा की आगामी राजनीति से जुड़ा हुआ है, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है। क्या संसद के ऊपरी सदन की सीटों की गणित के लिए लोकसभा के जनादेश को पुनर्लेखित किया जा रहा है? क्या चुने हुए सांसद अब जनता के प्रतिनिधि कम और राजनीतिक शतरंज के मोहरे ज्यादा बनते जा रहे हैं? उधर उद्धव ठाकरे अपने सांसदों और विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटे हैं। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर संभावित बागियों को अलग मान्यता न देने की मांग की जा चुकी है। बैठकों का दौर जारी है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह नहीं है कि बैठक में क्या होगा, बल्कि यह है कि बैठक के बाद कौन बचेगा और कौन जाएगा। देश के सामने आज कुछ ज्वलंत सवाल खड़े हैं। क्या लोकतंत्र में जनादेश की कोई कीमत बची है? क्या दल बदल विरोधी कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुका है? क्या राजनीतिक दलों को तोडऩा अब चुनाव जीतने से आसान रास्ता बन गया है? और सबसे बड़ा सवाल यदि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बार-बार इस तरह राजनीतिक पाला बदलते रहेंगे तो आने वाले समय में मतदाता किस पर भरोसा करेगा?
विधायकों के साथ अलग से मीटिंग
इसके अलावा शिवसेना (यूबीटी) ने 22 जून को शाम चार बजे पार्टी कार्यालय में सभी विधायकों की मीटिंग बुलाई है। मुख्य सचेतक सुनील प्रभु और एमएलसी अनिल परब की ओर से लिखे पत्र में कहा गया, शिवसेना (यूबीटी) विधायक दल (विधानसभा और विधान परिषद दोनों) के सभी सदस्यों की बैठक 22 जून को शाम 4 बजे मुंबई में मंत्रालय के सामने स्थित शिवालय में बुलाई गई है। पार्टी प्रमुख उद्धव बालासाहेब ठाकरे इस बैठक में मार्गदर्शन करेंगे। आपसे अनुरोध है कि उक्त बैठक में समय पर उपस्थित हों।
बगावत को कुचलने की उद्धव की एक और कोशिश
पार्टी के अंदर चल रही उथल-पुथल के बीच शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने एक बार फिर सांसदों की बैठक बुलाई है। इसके पहले रविवार को सांसदों की बैठक बुलाई गयी थी जिसमें तीन सांसद शामिल हुए थे। शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा मुख्य सचेतक अनिल देसाई ने सांसदों को पत्र भेजा है। पत्र में लिखा गया है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) पार्टी के सभी लोक सभा सदस्यों को सूचना दी जाती है कि पार्टी के विभिन्न मुद्दों को लेकर संसदीय दल की अहम बैठक गुरुवार, 18 जून, 2026 को दिन में 11:00 बजे, संसदीय दल कार्यालय 128-ए, संविधान सदन, संसद भवन, नई दिल्ली में रखी गई है। पार्टी के सभी लोक सभा सदस्यों से निवेदन है कि बैठक में अनिवार्य रूप से मौजूद रहें।
कांग्रेस का शाह पर साजिश रचने का लगाया आरोप
इससे पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने गृह मंत्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने टीएमसी के 2० बागी सांसदों को अलग कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी (एनसीपी) में शामिल करने की साजिश रची। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि इस कदम का मकसद एनडीए की लोकसभा में ताकत बढ़ाना था। उन्होंने कहा कि इस तरह की साजिश भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बड़ा झटका है।
महुआ मोइत्रा के इस विषय पर विवादित पोस्ट
महुआ मोइत्रा सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, सिर्फ 15 करोड़ रुपए? सस्ते में क्यों जा रहे हैं? मुझे लगता है हमारे को 4 करोड़ रुपए अग्रिम और अगले 36 महीनों के लिए हर महीने 1 करोड़ रुपए मिला है। … हनी प्लस मनी। महुआ ने एक अन्य पोस्ट में कहा कि एनसीपीआई तो कुत्ते की पूंछ का आखिरी बाल भी नहीं है। असली कुत्ता तो टीएमसी से अलग हुआ गुट है। अब एनसीपीआई से उम्मीद की जा रही है कि वही उस कुत्ते को नचाए। यह बिल्कुल संभव नहीं है। अभिषेक मनु संघवी का धन्यवाद, जिन्होंने बात को उसी तरह कहा जैसी वह वास्तव में है!




