दिमागी नक्सल पर राजनीतिक दंगल

  • एक बयान से सियासत में छिड़ी नई वैचारिक जंग
  • मोदी का दिमागी नक्सल विपक्ष ने बना दिया हथियार, लौटाकर सत्ता पर करारा वार
  • लाल किले से निकला शब्द अब विपक्ष की जुबान पर, बीजेपी का पलटवार तेज

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने एक शब्द दिमागी नक्सल फेंका। इस शब्द का मकसद शायद विपक्ष पर निशाना साधना था लेकिन सियासत में कभी-कभी गोली निशाने पर नहीं लगती और बूमरैंग बनकर वापस लौट आती है। इस शब्द के साथ भी ऐसा ही हुआ। विपक्ष ने पीएम मोदी के इस बयान को डक करने के बजाए पलटवार कर दिया है।
विपक्ष कह रहा है कि सवाल पूछना दिमागी नक्सलवाद कैसे हो सकता है? चिंदम्बरम ने इसे गर्व का विषय बताया है तो मुफ्ती महबूबा भी इसका विरोध कर रही है। गौरतलब है कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ अपनी बात रखते हुए हथियारबंद नक्सलवाद के साथ वैचारिक चुनौती की बात की और दिमागी नक्सलियों को पहचानकर अलग थलग करने का आह्वान किया था।

दिमागी नक्सल का बूमरैंग

15 अगस्त की शाम तक जो शब्द प्रधानमंत्री के भाषण का हिस्सा था वह 16 और 17 अगस्त आते-आते सियासी पासवर्ड बन गया। कांग्रेस ने बयान पर पलटवार करते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम को मैदान में उतरा। उन्होंने कहा कि अगर आलोचना करना सवाल पूछना और अपनी सोच रखना दिमागी नक्सल होना है तो उन्हें ऐसा कहलाने पर गर्व है। इसके बाद जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इसी शब्द को पकड़ लिया और आर्टिक्ल 370 के समर्थन के संदर्भ में खुद को दिमागी नक्सल कह दिया। महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की आवाज भी इस लड़ाई में कूद गई है। पार्टी के प्रवक्ता नसीम सिद्दीकी ने आरएसएस की तुलना जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान से करते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।

बीजेपी भी पीछे हटने को तैयार नहीं

दूसरी तरफ बीजेपी ने चिदंबरम के बयान को पकड़कर पलटवार तेज कर दिया है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने सवाल उठाया है कि अगर कोई दिमागी नक्सल शब्द को गर्व से स्वीकार करता है तो फिर नक्सलवाद को लेकर कांग्रेस की वास्तविक स्थिति क्या है। उन्होंने झीरम घाटी जैसी घटनाओं का संदर्भ देते हुए नक्सल हिंसा की गंभीरता पर जोर दिया। यानी सत्ता पक्ष की रणनीति साफ दिखाई देती है कि लेबल को छोड़ना नहीं है बल्कि विपक्ष से उसी लेबल की व्याख्या करवानी है। और विपक्ष की रणनीति भी उतनी ही साफ है कि लेबल से डरना नहीं है बल्कि उसे उल्टा राजनीतिक हथियार बना देना है।

बयान से बड़ा बन गया बयान का जवाब

प्रधानमंत्री का बयान एक दिन की खबर था लेकिन उसके बाद चिदंबरम का जवाब आया और फिर बीजेपी का पलटवार इसके बाद फिर महबूबा मुफ्ती फिर आप और अब शरद पवार एनसीपी यानी एक बयान की राजनीतिक उम्र बढ़ती जा रही है और हर नया बयान पुराने बयान को और बड़ा बना रहा है। इसे ही राजनीति का बूमरैंग इफेक्ट कहा जा सकता है तो क्या दिमागी नक्सल का नया नैरेटिव बनेगा? या फिर विपक्ष इसे डराने वाला लेबल बनाकर सत्ता के खिलाफ इस्तेमाल करेगा यही असली लड़ाई है। क्योंकि 27 से पहले राजनीति पहले ही नैरेटिव की लड़ाई में बदल चुकी है। एक तरफ राष्ट्रवाद सुरक्षा और नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का नैरेटिव है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र असहमति और सवाल पूछने के अधिकार का नैरेटिव। और दिमागी नक्सल शब्द इन दोनों नैरेटिव को एक ही मंच पर ला खड़ा करता है। इसलिए यह सिर्फ बयान नहीं है यह अगले कई महीनों की राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन सकता है।

अब महाराष्ट्र से आया सबसे तीखा वार

एनसीपी शदर पवार प्रवक्ता नसीम सिद्दीकी ने आरएसएस को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने आरएसएस की तुलना जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान से करते हुए आरोप लगाया कि कुछ संगठनों की विचारधारा समाज को जोडऩे के बजाय विभाजन और हिंसा की ओर ले जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आज भी कुछ लोग गांधीजी के हत्यारे का महिमामंडन करते हैं। यह आरोप अपने आप में गंभीर हैं और इनके जवाब में बीजेपी/आरएसएस की प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इस बयान का महत्व इससे भी बड़ा है। क्योंकि अब दिमागी नक्सल की बहस एकतरफा आरोप से निकलकर वैचारिक आरोप प्रत्यारोप के खुले मैदान में पहुंच गई है। एक तरफ नक्सलवाद का लेबल। दूसरी तरफ संघ पर वैचारिक चरमपंथ के आरोप। बीच में कांग्रेस, एनसीपी आप और दूसरे राजनीतिक दल और ऊपर से सोशल मीडिया। यानी एक ऐसा मुद्दा तैयार हो चुका है जिसे अगले कई दिनों तक दोनों खेमे अपने-अपने नैरेटिव के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

एक शब्द… कई जवाब

प्रधानमंत्री के बयान के बाद विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। चिदंबरम के बाद महबूबा मुफ्ती की प्रतिक्रिया ने विवाद को कांग्रेस से बाहर जम्मू-कश्मीर की राजनीति तक पहुंचा दिया। एनसीपी के बयान के बाद इस बयान की तपिश की जद में महाराष्ट्र भी शामिल हो चुका है। आप की तरफ से भी प्रधानमंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए खुद को दिमागी नक्सल कहने की बात कही जा चुकी है। यानी जिस शब्द को प्रधानमंत्री ने वैचारिक खतरे के रूप में पेश किया था विपक्ष का एक हिस्सा उसे राजनीतिक तंज और प्रतिरोध के प्रतीक में बदलता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि विवाद अब ठंडा होने के बजाय फैलता जा रहा है।

विपक्ष को एकजुट करता दिमागी नक्सल

कहानी अब सिर्फ मोदी बनाम चिदंबरम नहीं रही कहानी यह है कि क्या दिमागी नक्सल का शब्द विपक्ष को डराने के बजाय उसे एकजुट करने लगा है। क्या जिस शब्द को राजनीतिक हथियार बनाकर इस्तेमाल किया गया था विपक्ष उसी हथियार को उलटकर सत्ता पर चला रहा है। और सबसे बड़ा सवाल क्या 2026 की राजनीति में अब बहस मुद्दों पर नहीं लेबलों पर लड़ी जाएगी? आप हमें दिमागी नक्सल कहिए हम कहेंगे हां हैं। आप एक नाम देंगे वह नाम अगले दिन राजनीतिक पहचान बन जाएगा। यही इस विवाद का सबसे खतरनाक और सबसे दिलचस्प मोड़ है। क्योंकि राजनीति में किसी विरोधी को बदनाम करने के लिए दिया गया नाम जब विरोधी गर्व से अपनाने लगे तो समझिए कहानी पलट चुकी है। और दिमागी नक्सल की कहानी शायद अब उसी मोड़ पर खड़ी है।

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