सीएम पद की दावेदारी से पार्टी में बगावत, 97 प्रतिशत विधायकों ने जताया असंतोष
दिल्ली में बैठे अमित शाह को लगता था कि वे जोड़-तोड़ करके और दबाव बनाकर बिहार की सत्ता पर कब्ज़ा कर लेंगे। उन्होंने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाया, उन्हें बड़ी ज़िम्मेदारियाँ दीं,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बिहार की राजनीति में इस वक्त वो तूफान आया है जिसकी कल्पना शायद ही पीएम साहब और उनके चाणक्य अमित शाह ने सपने में भी की होगी। जो बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री बिठाने के ख्वाब देख रही थी, आज उसी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई है।
दैनिक भास्कर के एक चौंकाने वाले खुलासे ने पटना से दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है। खबर है कि जदयू के 68 विधायक किसी भी कीमत पर बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं चाहते। ताज्जुब की बात देखिए कि 97 प्रतिशत विधायकों की डिमांड है कि नीतीश कुमार के बाद उनके बेटे निशांत कुमार सीएम बनें, जबकि बीजेपी के बड़े चेहरे सम्राट चौधरी के नाम पर सिर्फ 2 विधायक राजी हुए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले बिहार में कोई बहुत बड़ा ‘खेला’ होने वाला है?
दिल्ली में बैठे अमित शाह को लगता था कि वे जोड़-तोड़ करके और दबाव बनाकर बिहार की सत्ता पर कब्ज़ा कर लेंगे। उन्होंने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाया, उन्हें बड़ी ज़िम्मेदारियाँ दीं, ताकि वे अगले सीएम बन सकें। लेकिन भास्कर की रिपोर्ट ने बीजेपी के इस गुब्बारे की हवा निकाल दी है।
यह बात बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त से ही कही जा रही थी, यहाँ तक कि खुद बीजेपी के कई सीनियर नेताओं ने इस बात को स्वीकार किया था कि अगर बीजेपी किसी भी तरह नीतीश कुमार को सीएम बना देती है, तो वह छह महीने से ज़्यादा उन्हें कुर्सी पर टिकने नहीं देगी; और यह बात अब कहीं न कहीं सही साबित हुई है। सच में नीतीश कुमार को बहुत ही नाटकीय ढंग से सीएम की कुर्सी से उतारा जा रहा है और इसके लिए बकायदा पूरा एक ‘मकड़जाल’ बुना गया है। निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री के बहाने नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू को साइडलाइन करने की पूरी तैयारी है।
खबर है कि नीतीश की जगह बीजेपी अब अपना सीएम बनाएगी। तीन नामों की चर्चाएं सीएम पद को लेकर तेज़ हैं, जिसमें सम्राट चौधरी से लेकर दो अन्य नेताओं के नाम चल रहे हैं। कुछ गठबंधन के नेताओं के नाम की भी चर्चाएं हैं, लेकिन बीजेपी शायद ही ऐसा करे। पीएम साहब के चाणक्य जी सिर्फ और सिर्फ इसलिए ही नीतीश को किनारे लगा रहे हैं ताकि बिहार में ‘दिल्ली’ के इशारों पर नाचने वाला सीएम होना चाहिए; क्योंकि नीतीश और बीजेपी सच में दो अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियाँ हैं।
बस नीतीश कुमार की कुर्सी का स्वार्थ था जो आज तक बीजेपी और जदयू को जोड़े हुए था, लेकिन अब लगभग यह फाइनल हो गया है कि नीतीश कुमार की कुर्सी बीजेपी अपने पाले में लेने जा रही है और निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री के नाम पर नीतीश को राज्यसभा भेजा जा रहा है। अचानक यह गेम उल्टा पड़ गया है, क्योंकि एक सर्वे सामने आया है जिसने न सिर्फ बीजेपी बल्कि नीतीश कुमार और जदयू में छिपे ‘गुजरात लॉबी’ के नेताओं को हिला दिया है। नीतीश भले ही इस्तीफा देकर दिल्ली जाने वाले हों, लेकिन पार्टी किसी कीमत पर यह नहीं चाहती कि सीएम की कुर्सी बीजेपी की झोली में डाल दी जाए।
जदयू के अंदरखाने जो सर्वे और बातचीत हुई है, उसने साफ़ कर दिया है कि सम्राट चौधरी के नाम पर जदयू के विधायक एक कदम भी साथ चलने को तैयार नहीं हैं। 68 विधायकों में से सिर्फ 2 विधायक ऐसे हैं जो सम्राट चौधरी के पक्ष में हैं। यह मोदी-शाह की उस ‘चाणक्य नीति’ पर करारा तमाचा है जो मानती है कि वे किसी को भी कहीं भी थोप सकते हैं। बिहार की मिट्टी और वहाँ के नेताओं ने बता दिया है कि यहाँ दिल्ली की ‘तानाशाही’ नहीं चलेगी।
इस पूरी रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प पहलू निशांत कुमार का उभरना है। नीतीश कुमार के बेटे निशांत, जो अब तक राजनीति से कोसों दूर रहते थे, आज जदयू के 97 प्रतिशत विधायकों की पहली पसंद बन गए हैं। विधायकों का साफ कहना है कि अगर नीतीश कुमार कुर्सी छोड़ते हैं, तो उनकी विरासत सिर्फ और सिर्फ निशांत ही संभालेंगे।
विधायकों का तर्क सीधा है कि वे बीजेपी के किसी ऐसे नेता के नीचे काम नहीं करेंगे जो उनकी पार्टी को ही तोड़ने की साज़िश रचता रहा हो। मोदी-शाह की जोड़ी ने जिस तरह से महाराष्ट्र और बाकी राज्यों में पार्टियों को खत्म किया, जदयू के विधायक उससे डरे हुए भी हैं और सतर्क भी। उन्हें लगता है कि निशांत के आने से पार्टी एकजुट रहेगी और बीजेपी की ‘गंदी राजनीति’ से बची रहेगी।
वैसे तो अमित शाह को पीएम साहब का ‘चाणक्य’ कहा जाता है, लेकिन बिहार ने बार-बार साबित किया है कि यहाँ उनकी चाणक्य नीति फेल हो जाती है। बीजेपी का प्लान था कि नीतीश कुमार को राज्यपाल बनाकर या केंद्र में भेजकर बिहार की कमान सम्राट चौधरी या किसी और बीजेपी नेता को सौंप दी जाए। लेकिन अमित शाह यह भूल गए कि जदयू के विधायक ‘रबर स्टैम्प’ नहीं हैं। बीजेपी की ‘हड़प नीति’ को बिहार के विधायकों ने पहचान लिया है।
विधायकों को बखूबी पता है कि जैसे ही बीजेपी का सीएम बना, जदयू का अस्तित्व खत्म कर दिया जाएगा। इसलिए ये 68 विधायक अब ढाल बनकर खड़े हो गए हैं। मोदी जी, बिहार को समझना इतना आसान नहीं है जितना आप रैलियों में समझते हैं। यहाँ का विधायक अपनी अस्मिता से समझौता नहीं करेगा।
चर्चा है कि नीतीश कुमार जल्द ही सीएम पद से इस्तीफा दे सकते हैं। लेकिन इस इस्तीफे से पहले जो ‘खेल’ शुरू हुआ है, वह बीजेपी के लिए डरावना है। अगर जदयू के विधायक अड़ गए कि सीएम सिर्फ निशांत बनेंगे, तो बीजेपी के पास दो ही रास्ते बचेंगे—या तो नीतीश की शर्त मान ले, या फिर सरकार से बाहर हो जाए।
इधर विपक्ष भी पूरी नज़र बनाए हुए है। अगर बीजेपी और जदयू में ठन गई, तो बिहार में एक नया गठबंधन भी देखने को मिल सकता है। अमित शाह जो जाल बुन रहे थे, अब वे खुद उसमें फंसते नज़र आ रहे हैं। बिहार की सियासत में ‘नीतीश बाबू’ को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, और इस बार उन्होंने अपने विधायकों के ज़रिए मोदी-शाह को ‘चेकमेट’ कर दिया है।
दूसरी ओर खबर है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेंगे। इसके लिए वे 9 अप्रैल को दिल्ली जाएंगे। 10 अप्रैल को शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुलाकात दिल्ली में एनडीए के कई आला नेताओं से होगी। इसमें ताज़ा राजनीतिक हालात पर चर्चा होने की प्रबल संभावना है। इसके साथ ही यह भी संभावना जताई जा रही है कि सीएम नीतीश कुमार 11 अप्रैल को पटना लौट आएंगे। बिहार में 14 अप्रैल के बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। इसके पहले एनडीए विधायक दल की बैठक भी बुलाई जा सकती है।
इसके अलावा, जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक 20 अप्रैल या उसके बाद होने की संभावना है। हाल ही में जदयू संगठन के चुनाव हुए हैं और इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में एक बार फिर नीतीश कुमार चुने गए हैं। इस चुनाव के बाद यह बैठक बेहद खास मानी जा रही है, क्योंकि इसमें कई बड़े राजनीतिक प्रस्तावों पर मुहर लगाई जा सकती है। हालांकि, राज्यसभा सदस्य बनने से पहले सीएम नीतीश कुमार को ‘ज़ेड प्लस’ सिक्योरिटी दी गई है।
गृह विभाग की ओर से जारी लेटर में कहा गया है कि सीएम नीतीश कुमार को बिहार स्पेशल सिक्योरिटी एक्ट-2000 के तहत सुरक्षा अनुमान्य है। चूंकि वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं और जल्द ही मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर सदस्यता ग्रहण करेंगे, इसलिए उनकी सुरक्षा की समीक्षा की गई और ‘ज़ेड प्लस’ कैटेगरी की सुरक्षा देने का निर्णय लिया गया।
राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार इस्तीफा दे सकते हैं, ऐसे में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, इसकी चर्चा तेज़ है। बीजेपी और जदयू के कई नेताओं के नाम हवा में हैं। खासकर दो नाम सबसे प्रबल माने जा रहे हैं। बीजेपी से डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को समर्थन देने की बात हो रही है, जबकि जदयू से निशांत कुमार को सीएम फेस बताया जा रहा है। लेकिन अब तक एनडीए की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई ऐलान नहीं किया गया है। अंदरखाने में चर्चा है कि पेच बुरी तरह फंसा हुआ है।
जदयू के विधायकों और पार्टी संगठन की पुरज़ोर डिमांड है कि निशांत कुमार को ही सीधे सीएम बनाया जाए। कुछ का तो यह भी दावा है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पार्टी में बड़ा विद्रोह हो सकता है, क्योंकि जिस तरह से विधायक और संगठन निशांत के लिए सक्रिय हैं, वह बीजेपी और खासकर ‘चाणक्य’ जी के लिए खतरे की घंटी है। नीतीश कुमार गठबंधन बदलने के पुराने खिलाड़ी हैं और वे सिर्फ बिहार में नहीं, बल्कि केंद्र में भी मोदी सरकार को ज़ोर का झटका देने की हैसियत रखते हैं। ऐसे में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा; लेकिन भास्कर की यह सर्वे रिपोर्ट कि जदयू विधायक निशांत को ही सीएम बनाना चाहते हैं, पीएम मोदी के चाणक्य के लिए बहुत बड़ा ‘शॉक’ साबित हो सकती है।



