चीखा विपक्ष, सौतेला बजट
अगर विकास सबका है तो बजट कुछ का ही क्यों?

- मेरे पूरे राजनीतिक करियर का सबसे निराशाजनक केंद्रीय बजट : सिद्धारमैया
- नवीन पटनायक ने केंद्रीय बजट की आलोचना की बोले- ओडिशा को कोई खास फायदा नहीं मिला
- एक्सपर्ट ने माना बजट बाजार को भरोसा तो देता है लेकिन जनता को राहत देने में पीछे
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सरकार जिस बजट को विकास का उत्प्रेरक बता रही है वही बजट विपक्ष की नजर में राज्यों के साथ किया गया संस्थागत भेदभाव बनकर उभरा है। संसद के भीतर तारीफों की तालियां बजीं लेकिन संसद के बाहर राज्यों से उठती आवाजें साफ कह रही हैं कि यह बजट संघीय ढांचे की आत्मा पर चोट है। जिन राज्यों ने देश की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान दिया है उन्हें या तो नजरअंदाज किया गया या फिर प्रतीकात्मक आश्वासनों के हवाले छोड़ दिया गया है।

विपक्ष ने की कड़े शब्दों में बजट की आलोचना
ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बेहद संयमित लेकिन तीखे शब्दों में कहा है कि इस केंद्रीय बजट से ओडिशा को कोई ठोस लाभ नहीं मिलने वाला। यह बयान केवल एक राज्य की पीड़ा नहीं बल्कि उस भावना की अभिव्यक्ति है जिसमें गैर भाजपा शासित राज्यों को बार-बार खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस होता है। बीजद के राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा ने तो इसे और साफ शब्दों में कहा कि ओडिशा को फिर अनदेखा किया गया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का बयान इस बजट पर सबसे कठोर राजनीतिक टिप्पणी बनकर सामने आया। उन्होंने बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मेरे पूरे राजनीतिक करियर का यह सबसे निराशाजनक केंद्रीय बजट है। यह वाक्य केवल नाराजगी नहीं है बल्कि उस निराशा का दस्तावेज है जो दक्षिणी राज्यों में वर्षों से पनप रही है। जहां राजस्व योगदान ज्यादा है और केंद्रीय सहयोग कम।
सरकार ने देश के संकट को नजरअंदाज किया : राहुल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय बजट 2026-2027 की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत के वास्तविक संकटों को नजरअंदाज करता है और सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाता। एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि विनिर्माण क्षेत्र गिर रहा है, निवेशक पूंजी निकाल रहे हैं और घरेलू बचत में भारी गिरावट आ रही है। लोकसभा में विपक्ष के नेता गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि किसान संकट में हैं। राहुल गांधी ने कहा कि युवा बेरोजगार हैं। विनिर्माण क्षेत्र गिर रहा है। निवेशक पूंजी निकाल रहे हैं। घरेलू बचत में भारी गिरावट आ रही है। किसान संकट में हैं। वैश्विक संकटों का खतरा मंडरा रहा है – इन सब की अनदेखी की जा रही है। एक ऐसा बजट जो सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाता, भारत के वास्तविक संकटों को नजरअंदाज करता है। केंद्रीय बजट रविवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किया गया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बजट को फीका बताया। उन्होंने कहा कि बजट भाषण में प्रमुख कार्यक्रमों और योजनाओं के लिए बजटीय आवंटन के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने एक पोस्ट में कहा कि हालांकि दस्तावेजों का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है, लेकिन 90 मिनट के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि बजट 2026/27 इसके प्रचार के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है। यह पूरी तरह से नीरस था। भाषण भी अपारदर्शी था क्योंकि इसमें प्रमुख कार्यक्रमों और योजनाओं के लिए बजटीय आवंटन के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।
उत्साहजनक नहीं है एक्सपर्ट की राय
अर्थशास्त्रियों और औद्योगिक संगठनों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संतुलित रही है लेकिन पूरी तरह उत्साहजनक नहीं। सीआईआई और अन्य उद्योग संगठनों ने इंफ्र ास्ट्रक्चर और कैपेक्स पर जोर का स्वागत किया है पर साथ ही यह भी माना कि खपत को बढ़ाने के लिए बजट में ठोस कदमों की कमी है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए सीधी राहत के अभाव में आर्थिक मांग को गति देना कठिन होगा। राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर भी सवाल उठाए गए हैं। क्योंकि बढ़ता केंद्रीय नियंत्रण संघीय ढांचे को कमजोर कर सकता है। औद्योगिक दृष्टि से बजट स्टेबल है लेकिन ब्रेकथ्रू नहीं। एमएसएमई सेक्टर, कृषि आधारित उद्योग और स्टार्टअप्स को लेकर घोषणाएं अपेक्षाकृत सतही मानी जा रही हैं। कुल मिलाकर विशेषज्ञों की राय है कि यह बजट बाजार को भरोसा तो देता है लेकिन जनता को राहत देने में पीछे रह जाता है।
कु छ को ही बजट से लाभ
तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने भी बजट को अन्यायपूर्ण करार देते हुए कहा है कि केंद्र सरकार ने तेलंगाना के साथ एक बार फिर सौतेला व्यवहार किया है। न सिंचाई परियोजनाओं पर ठोस घोषणा न औद्योगिक प्रोत्साहन न ही विशेष वित्तीय सहायता। उन्होंने कहा कि यह बजट तेलंगाना की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता। इन बयानों को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ है। यह बजट केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं का नक्शा है। और इस नक्शे में कई राज्य कई वर्ग और कई क्षेत्र सिरे से गायब हैं। सरकार विकास सबका का नारा देती है लेकिन विपक्ष सवाल पूछ रहा है कि अगर विकास सबका है तो बजट कुछ का ही क्यों?
बंगाल के प्रति भाजपा का सौतेला रवैया : अभिषेक
तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी ने पेश केंद्रीय बजट को चुनावी राज्य बंगाल के प्रति भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ”सौतेले रवैये” का प्रतिबिंब बताया। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का दावा करते हुए, तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा ”पश्चिम बंगाल की जनता को सबक सिखाने” की कोशिश कर रही है। तृणमूल मीडिया प्रकोष्ठ द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, बनर्जी ने संसद के बाहर पत्रकारों से कहा, ”बंगाल में वे हार रहे हैं। इसलिए भाजपा अपने सौतेले रवैये से लोगों को सबक सिखाने की कोशिश कर रही है।” लोकसभा में डायमंड हार्बर सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले बनर्जी ने कहा, ”लेकिन लोकतंत्र में यह बात उलटी पड़ती है। आने वाले चुनावों में जनता भाजपा को मुंहतोड़ जवाब देगी।
मुझे ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं : प्रियंका
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा बजट सत्र में भाग लेने संसद पहुंचीं और उन्होंने कहा कि उन्हें केंद्रीय बजट 2026-27 से ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। बजट को लेकर प्रियंका गांधी ने कहा, मुझे ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं, लेकिन देखते हैं। इसके अलावा, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कई ढांचागत समस्याएं हैं जिनका समाधान एक दशक से नहीं हुआ है। तिवारी ने बताया, भारतीय अर्थव्यवस्था में कई ढांचागत समस्याएं हैं जिनका समाधान एक दशक से नहीं हुआ है। निजी पूंजी निवेश में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट आई है। मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद ढांचागत असमानताओं को समझेंगे और ईमानदारी से उनका समाधान करेंगे।
कई मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत : बशीर
आईयूएमएल सांसद ई.टी. मोहम्मद बशीर ने कहा कि एमजीएनआरईजीए की दुर्दशा तो सभी जानते हैं। आईयूएमएल सांसद ई.टी. मोहम्मद बशीर ने कहा, यह एक नाजुक मोड़ है। कई मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, खासकर भारत की मौजूदा स्थिति में। कई चीजों को गंभीरता से निपटाने की आवश्यकता है। हमें उम्मीद है कि ग्रामीण विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। हम सभी एमजीएनआरईजीए की दुर्दशा जानते हैं। उन्होंने इसकी पूरी संरचना बदल दी है। यह मनमोहन सिंह की तत्कालीन सरकार द्वारा उठाया गया सबसे क्रांतिकारी कदम था।
विपक्ष के आरोपों को सरकार ने नकारा
सरकार यह भी कहती है कि राज्यों के लिए कर हस्तांतरण और ग्रांट्स की प्रक्रिया पहले से तय फॉर्मूले पर आधारित है न कि राजनीतिक पसंद नापसंद पर। बजट भाषण में कोऑपरेटिव फेडरलिज़्म का उल्लेख कर सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की कि केंद्र राज्य संबंधों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है।



