केरल में विस चुनाव का महासंग्राम

मोदी-राहुल आमने-सामने मचेगा घमासान

  • राहुल गांधी की तीन रैलियां पीएम मोदी का रैली के साथ रोड शो
  • मोदी मॉडल बनाम केरल मॉडल टकराव सिर्फ चुनावी नहीं वैचारिक है
  • 9 अप्रैल को होने वाली वोटिंग से पहले सियासत का पारा चढ़ा

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। केरल की हवा इस बार सिर्फ चुनावी नहीं बल्कि टकराव की गंध से भरी हुई है। 9 अप्रैल को होने वाली वोटिंग से पहले सियासत का पारा इतना चढ़ चुका है कि हर बयान हर रैली और हर रोड शो एक खुली चुनौती बन रहा है। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सबसे मुखर चेहरे सीधे मोर्चा संभाले हुए हैं बिना झिझक बिना नरमी के। केरल में लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं है। यह उस सोच की लड़ाई है जिसमें एक तरफ केंद्रीकृत ताकत का मॉडल है और दूसरी तरफ क्षेत्रीय पहचान सामाजिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों की बात। केरल में हमेशा से राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए नहीं बल्कि विचारधारा के लिए लड़ी जाती रही है और इस बार यह टकराव अपने चरम पर है।

सदन के बाद सड़क पर पीएम मोदी और राहुल गांधी में टक्कर

आज नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी केरल में तीन बड़ी रैलियां के जरिये केरल के मतदाताओं के सामने अपनी बात रखेंगें। राहुल गांधी राज्य के 3 जिलों में आयोजित अलग-अलग 4 कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। राहुल गांधी का यह केरल दौरा ऐसे समय हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भाजपा नीत एनडीए उम्मीदवारों के समर्थन में केरल में रैली करेंगे और एक रोड शो में भी हिस्सा लेंगे। गौरतलब है कि केरल में त्रिकोणीय मुकाबला है जिसमें एलडीएफ, यूडीएफ और एनडीए आमने-सामने हैं। माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ के सामने सत्ता को बरकरार रखने की चुनौती है जबकि कांग्रेस नीत यूडीएफ वापसी की कोशिश में है और भाजपा नीत एनडीए को बड़ी सफलता की उम्मीद है। केरल में भाजपा का प्रमुख गठबंधन सहयोगी बीडीजेएस है। क्षेत्रीय पार्टी ट्वेंटी-20 भी एनडीए का हिस्सा बन चुकी है। वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी), शिवसेना और कॉनराड संगमा के नेतृत्व वाली नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) जैसे दल भी एनडीए का हिस्सा हैं। केरल विधानसभा के 14० सदस्यों के चुनाव के लिए 9 अप्रैल को होने वाले हैं। वोटों की गिनती और परिणाम 4 मई 2026 को घोषित किए जाएंगे। इस बार केरल विधानसभा चुनाव में कुल 890 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के अनुसार केरल चुनाव में 2.71 करोड़ मतदाता अपना वोट डालने के पात्र हैं।

राहुल पेश कर रहे हैं जबर्दस्त चुनौती

प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में केरल को विकास इंफ्रास्ट्रक्चर और डबल इंजन सरकार के वादों से जोड़ते हैं। लेकिन राहुल गांधी उसी मंच से सवाल खड़ा कर देते हैं कि अगर पीएम मोदी का माडल इतना ही सफल है तो देश के बाकी हिस्सों में बेरोजगारी महंगाई और सामाजिक तनाव क्यों बढ़ रहा है? यह सीधा हमला है उस नैरेटिव पर जिसे बीजेपी वर्षों से गढ़ती आई है। केरल का चुनाव त्रिकोणीय है एलडीएफ, यूडीएफ और एनडीए तीनों अपनी-अपनी जमीन बचाने और बढ़ाने में लगे हैं। लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में है कि क्या बीजेपी इस बार कोई बड़ा सेंध लगा पाएगी या फिर यह लड़ाई एक बार फिर पारंपरिक एलडीएफ बनाम यूडीएफ के बीच सिमट जाएगी?

पीएम मोदी वर्सेज राहुल गांधी में कौन पड़ेगा भारी

राहुल गांधी केरल में सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि एक संदेश बनकर सामने आ रहे हैं। एक ऐसा संदेश जो सीधे सत्ता से सवाल करता है। उनके भाषणों में अब पहले जैसी झिझक नहीं बल्कि आक्रामकता है आंकड़ों का सहारा है और सबसे अहम सीधा संवाद है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा उनका अनुभव और उनकी आक्रामक चुनावी शैली भी कम नहीं है। लेकिन केरल की जमीन हमेशा से अलग रही है यहां भावनाओं से ज्यादा तर्क चलते हैं और नारों से ज्यादा काम की पड़ताल होती है। ऐसे में सवाल बड़ा साफ है क्या इस बार भी केरल अपने पारंपरिक ढर्रे पर चलेगा या फिर कोई नया राजनीतिक मोड़ इतिहास लिखने वाला है? पीएम नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले दौरों में केरल को विकास से पीछे छूटा हुआ बताने की कोशिश की और केंद्र की योजनाओं को राज्य की प्रगति का रास्ता बताया। लेकिन लेकिन राहुल गांधी का जवाब सीधा और तीखा रहा उन्होंने कहा कि केरल का मॉडल शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय पर खड़ा है जबकि बीजेपी का मॉडल कॉर्पोरेट और केंद्रीकरण पर। केरल में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वहां उसका संगठनात्मक ढांचा अभी भी सीमित है।

क्या बदल सकता है चुनावी गणित?

केरल में बीजेपी के लिए रास्ता कठिन है लेकिन वह नैरेटिव बदलने की कोशिश में है। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ राज्य की जीत नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वापसी का संकेत देने का मौका है। यह चुनाव सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि केरल में कौन सरकार बनाएगा बल्कि यह भी तय करेगा कि देश में विपक्ष की आवाज कितनी मजबूत है। अगर राहुल गांधी यहां प्रभावी प्रदर्शन करते हैं तो यह सीधा संदेश होगा कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई सिर्फ संभव ही नहीं बल्कि संगठित भी हो सकती है। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो पीएम नरेन्द्र मोदी का अजेय नेतृत्व वाला नैरेटिव और मजबूत होगा।

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