पिक्चर तो बहाना है बस पंडितों को लुभाना है!

  • ‘घूसखोर पंडित’ पिक्चर बन गयी राजनीतिक पोस्टर
  • सभी सियासी दल मुखर
  • यूपी में तो बात एफआईआर तक पहुंची

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में शोर अक्सर मुद्दों पर नहीं होता। बल्कि शोर खुद मुद्दा बना दिया जाता है। इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। एक फिल्म आयी है घुसखोर पंडित और इस नाम ने जैसे सत्ता के गलियारों में सायरन बजा दिया हो। फिल्मी विरोध, बयान और एफआईआर के साथ कुछ ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है जो ब्रहमण समाजा को लुभा सके। सब कुछ एक साथ इतनी तेजी से हो रहा है कि पूछिये मत। विरोध के स्वरों ने आसमान सर पर उठा रखा है। फिल्म के टाइटल को सीधे ब्रहमण समाज की अस्मिता से जोड़ा जा रहा है। यूपी में तो बात एफआईआर तक पहुंच चुकी है। बिना फिल्म को देखे, बिना फिल्म को जांचे। सवाल यही है कि क्या किसी फिल्म के टाइटल भर से किसी समाज को उस पहलू से देखना सही है। क्योंकि बालीवुड में इससे पहले इस तरह के टाइटल और आरोपों को लेकर दर्जनों ऐसी फिल्में बनी हैं और रिलीज की जा चुकी है। अब सवाल यही है कि जो प्रतिक्रिया खड़ी की जा रही है वह किसे साध रही है।

क्या क्या न हुआ… आप की खातिर?

याद कीजिए जब एक शंकराचार्य से कथित बदसलूकी की खबरें आयीं जब भक्तों के साथ मारपीट और चोटी पकड़कर घसीटने जैसे आरोप सामने आए तब सत्ता का स्वर संयत रहा। मणिकर्णिका घाट को लेकर गंभीर आरोप लगे पर कार्रवाई पर बहस ने उतनी रफ्तार नहीं पकड़ी। ब्राह्मण विधायकों की बैठकों के बाद नाराजगी की खबरें तैरती रहीं पर सत्ता ने उसे प्रशासनिक शोर कहकर टाल दिया। ब्राह्मण नेताओं पर कार्रवाइयों की चर्चा हुई पर व्यापक संवाद नहीं दिखा। लेकिन अचानक एक फिल्म के शीर्षक से ऐसा रायता फैला कि पूरा नैरेटिव ही बदल गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कहा जा रहा है कि फिल्मी मुद्दे पर सूबे के मुख्यमंत्री के स्तर से एफआईआर की बात सामने आई। मीडिया रिपोर्ट्स ने इसे असाधारण बताया। यह असाधारणता इसलिए भी चौंकाती है क्योंकि जिन मामलों में सामाजिक संवेदनशीलता और धार्मिक मर्यादा का सवाल उठता रहा है वहा प्रतिक्रिया संयमित रही लेकिन यहां राज्य की पूरी मशीनरी जागती दिखी।

‘मनोज बाजपेयी के बहाने कला की आजादी पर बहस’

मनोज बाजपेयी के अभिनय की जितनी तारीफ की जाए, सच में उतनी कम है। उन्होंने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि उन्हें जीया है। सत्या का भीखू म्हात्रे हो, शूल का समर्पित पुलिस अफसर, अलीगढ़ का मौन और पीडि़त प्रोफेसर, या भोंसले का अकेला बूढ़ा आदमी। हर भूमिका में उन्होंने अभिनय की परिभाषा बदल दी। उनकी कला के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर पद्मश्री तक सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन पिछले दो दिनों से एक फिल्म के शीर्षक को लेकर उनका नाम विवाद में घसीटा जा रहा है। जबकि एक अभिनेता का काम सिर्फ अभिनय करना होता है। कहानी, शीर्षक, प्रस्तुति ,यह सब एक बड़ी रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। किसी किरदार के नाम या संदर्भ को लेकर अभिनेता को कठघरे में खड़ा कर देना कहीं न कहीं रचनात्मक स्वतंत्रता पर चोट है। बीते समय की फिल्मों को याद कीजिए कितनी ही फिल्मों में ठाकुर शब्द का इस्तेमाल विलेन के लिए हुआ। तब किसी ने इसे जातिगत अपमान नहीं माना। समाज ने समझा कि वह एक किरदार है, एक कथा का हिस्सा है। आज हम इतने असहिष्णु क्यों हो रहे हैं ! मैं स्वयं ब्राह्मण हूँ, लेकिन मेरी भावनाएं आहत नहीं हुईं। मेरा मानना है कि कोई भी धर्म या जाति इतनी संकुचित नहीं होनी चाहिए कि कल्पना और कहानी से भी डर जाए। कला समाज का आईना है, और आईने को तोड़ देने से सच्चाई नहीं बदलती। जरा-जरा सी बात पर एफआईआर दर्ज होना, कलाकारों और फिल्मकारों के मन में डर पैदा करता है। इससे रचनात्मकता सिमटती है, साहस घटता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, विचार और संवाद का माध्यम भी है। और अब जब NetFlix ने खुद स्पष्ट कर दिया है कि यह एक काल्पनिक चरित्र का नाम है और उन्होंने सोशल मीडिया सामग्री भी हटा दी है, तो इस विवाद को यहीं समाप्त मान लेना चाहिए। आगे बढऩा ही बेहतर है। सबसे अहम बात यदि आप कभी मनोज जी से मिलेंगे, तो पाएंगे कि वे एक महान अभिनेता ही नहीं, उससे कहीं बेहतर इंसान हैं। जब मैं उनसे मिला, घंटों की बातचीत में मैंने उनके भीतर की संवेदनशीलता, विनम्रता और गहराई को महसूस किया। इतनी सफलता के बावजूद उनमें अहंकार का नामोनिशान नहीं है। ऐसे कलाकार के साथ खड़ा होना सिर्फ एक अभिनेता का समर्थन करना नहीं, बल्कि कला, अभिव्यक्ति और संवेदनशील समाज के पक्ष में खड़ा होना है। मनोज जी, आप अभिनय के शिखर पर हैं और इंसानियत में उससे भी ऊंचे।

पहले भी बना है सिनेमा पहले भी बने हैं प्रतीक

भारतीय सिनेमा में जात्रि वर्ग और पहचान पर फिल्में पहली बार नहीं बनी है। इससे पूर्व में भी दलित उत्पीडऩ, पिछड़ी जातियों की पीड़ा, और अल्पसंख्यकों की पहचान को लेकर बनी फिल्मों ने बहसें भी पैदा कीं और विरोध भी हुए। पर अधिकतर मामलों में सत्ता ने दूरी बनाए रखी। कभी अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर तो कभी कानून-व्यवस्था के सहारे सत्ता ने इस तरह की कंट्रोवर्सी से खुद को अलग रखा। लेकिन इस बार नजारा अलग है और लोग पूछ रहे हैं कि तो यहां अपवाद क्यों? क्यों इस बार सत्ता खुद फ्रेम में उतर आयी है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी समुदाय के भीतर असंतोष की बातें उठने लगती हैं तो सत्ता हमदर्दी का नैरेटिव गढ़ती है। पहले असंतोष की खबरें फिर प्रतीकात्मक मुद्दा और अंत में संरक्षण का संदेश। यह रणनीति नई नहीं है लेकिन नया है इसका टाइमिंग और तीव्रता।

फिल्म कला की आजादी का हिस्सा

फिल्मकारों का तर्क रहता है कि शीर्षक और कथा कला की आजादी का हिस्सा हैं। विरोध करने वालों का कहना होता है कि इससे भावनाएं आहत होती हैं। सवाल यह नहीं कि कौन सही है सवाल यह है कि राज्य किसके साथ खड़ा दिखता है। जब सत्ता एक तरफ खुलकर खड़ी होती है तो बहस कला बनाम भावना से आगे जाकर राजनीति बन जाती है। घुसखोर पंडित एक फिल्म हो सकती है लेकिन उस पर खड़ा नैरेटिव सियासी पोस्टर बन चुका है। यह पोस्टर बताता है कि कैसे शोर पैदा कर भावनाएं साधी जाती हैं और कैसे चुप्पी से कठिन सवालों को टाल दिया जाता है। पूरी प्रष्ठभूमि में कौन सही है और कौन गलत से ज्यादा यह कहना उपयुक्त है कि जब सिनेमा सत्ता का औजार बन जाए तो फिल्म से ज्यादा राजनीति देखने लायक हो जाती है। तो क्या यह माना जाए कि पिक्चर तो बहाना है बस पंडितों को लुभाना है। समाजिक विशलेषक डीके त्रिपाठी कहते हैं कि जब ब्राह्मण समाज से जुड़े बड़े आरोपों और बड़ी कार्रवाइयों पर सत्ता चुप रही तब एक फिल्मी शीर्षक को लेकर पूरी ब्रादरी की अस्मिता के नैरेटिव को गढऩा मुनासिब नहीं लगात। वह कहते है कि क्या कुछ लोगों के विरोध को पूरे समाज का विरोध बताकर हमदर्दी का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो रही है?

 

आज की राजनीति ने समाज को खेमों में बांट दिया है। कहीं मुसलमान वोट बैंक हैं, कहीं ब्राह्मण। पर सच्चाई यह है कि दोनों ही सिर्फ इस्तेमाल हो रहे हैं। राजनीति के तराजू पर आज दोनों का वजन बराबर है। न सम्मान, न सुरक्षा, न न्याय। दोनों जानते हैं कि उन्हें गलत रास्ते पर मोड़ा गया है, लेकिन मजबूरी है कि आवाज उठाएं तो अकेले पड़ जाते हैं। अब वक्त है समझने का। लड़ाई जाति-धर्म की नहीं, हक, सम्मान और इंसाफ़ की है।
शेखर दीक्षित , अध्यक्ष राष्ट्रीय किसान मंच

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