क्यों बोला उत्तराखंड हाई कोर्ट — शक कितना भी मजबूत हो, सबूत नहीं बन सकता?
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजबूत संदेह भी सबूत का स्थान नहीं ले सकता. जस्टिस आशीष नैथानी ने अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक को बरी करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की.
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया. हाई कोर्ट ने कहा कि संदेह जितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता. कोर्ट ने ये टिप्पणी आत्महत्या के एक मामले में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए की. दरअसल हाई कोर्ट 2004 में खटीमा में हुए आत्महत्या के एक मामले में सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहा था.
जस्टिस आशीष नैथानी ने सत्र अदालत के सजा के फैसले को रद्द कर दिया. कोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक को भारतीय दंड सहिता की धारा 306 के तहत उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया. इस दौरान जस्टिस नैथानी ने साफ कहा कि कहा कि संदेह जितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता.
क्या है मामला
दरअसल ये मामला अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक की पत्नी की आत्महत्या से जुड़ा है. सुनील की पत्नी ने 15 सितंबर 2004 को आत्महत्या कर ली थी. जब पत्नी ने सुसाइड किया था उस दौरान वो अपने मायके में थी. वहीं उसने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी थी. शव का पोस्टमार्टम कराया गया, रिपोर्ट में हत्या का कोई संकेत नहीं मिला.
पति पर आरोप
सुनील दत्त पाठक पर आरोप था कि उसे अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था और उसने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिसकी वजह से पत्नी ने कथित तौर पर यह आत्मघाती कदम उठाया. मायके वालों ने सुनील के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई.
सत्र अदालत ने सुनाई सजा
उधमसिंह नगर की सत्र अदालत ने आरोपी सुनील दत्त पाठक को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोप से तो बरी कर दिया था. लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए दोषी ठहराते हुए उसे सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके साथ ही उस पर दस हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था.
हाई कोर्ट ने रद्द की सजा
सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर करते हुए अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक ने तर्क दिया कि आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे या उत्तेजना का कोई सबूत नहीं मिला. इसके साथ ही कोई आत्महत्या नोट भी बरामद नहीं हुआ.सुनील ने दलील दी कि सिर्फ वैवाहिक कलह या चरित्र के बारे में संदेह को उकसावा नहीं माना जा सकता. इसको लेकर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई और कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले रद्द कर दिया.



