जेपीएनआईसी को लीज पर देगी योगी सरकार

रंग लाई 4PM के संपादक संजय शर्मा की मुहिम

  • संपादक संजय शर्मा ने खटखटाया था कोर्ट का दरवाजा
  • शालीमार वाले संजय सेठ का भ्रष्टाचार लील गया अलिखेश यादव का सपना
  • सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का सरकार पर हमला बोले ये कैसी सरकार है

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। वल्र्ड क्लास सुविधाओं से लैस करोड़ों रूपयों के निमार्ण से बनी लखनऊ में एक इमारत खड़ी है जिसका नाम जेपीएनआईसी है। आज खबर आयी है कि इस इमारत को सरकार ने वृंदावन बॉटलर्स और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉट्र्स के कंसोर्टियम को लीज पर देने को मंजूरी दे दी है।
यह खबर इसलिए दर्दनाक और सवाल पूछने वाली है कि जेपीएनआईसी का सच इसके पीछे की सोच और इस इमारत को बनाने वाले बिल्डर संजय सेठ पर उठे सवाल अभी भी अनउत्तरित है। हालांकि इस फै सले केआने मे देर हुई है। इस पूरे मामले में 4पीएम के संपादक संजय शर्मा की भूमिका खास तौर पर चर्चा में रही। उन्होंने अधिवक्ता मोहम्मद हैदर के माध्यम से जनहित याचिका दाखिल कर जेपीएनआईसी से जुड़े फैसलों और उनकी प्रक्रिया पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी। इस बिल्डिंग का निमार्ण वर्ष 2013 में शुरू हुआ था और इसे शालीमार कॉर्प लिमिटेड को बनवाने का ठेका एलडीए ने दिया था। इस प्रोजेक्ट की शुरूआती कीमत करीब दो सौ पैंसठ करोड़ रुपये थी जिसकी सांशोधित लागत प्रोजेक्ट समाप्त होते होते नवंबर 2016 तक करीब आठ सौ पैंसठ करोड़ रुपये तक पहुंची। दावा किया जा सकता है कि किसी भी सार्वजनिक परियोजना में इतनी बड़ी लागत वृद्धि मिलना मुश्किल है।

संजय सेठ मतलब बदनामी का पुलिंदा

सरकार की दलील अपनी जगह है लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती कहानी तो यहां से शुरू होती है क्योंकि इस इमारत की नींव में सिर्फ सीमेंट और सरिया नहीं है। इसमें समाजवादी सत्ता का सपना है। सरकारी खजाने का पैसा है। निर्माण को लेकर उठे सवाल हैं। वर्षों तक बंद पड़ा एक विशाल परिसर है। और इस पूरी कहानी के बीच एक ऐसा नाम है जो राजनीति और रियल एस्टेट के बीच की दूरी को खुद में समेटे हुए है और वह है संजय सेठ। वही संजय सेठ जिनकी शालीमार कॉर्प का नाम के निर्माण से जुड़ा रहा। वही संजय सेठ जो कभी समाजवादी पार्टी की आंख-नाक-कान हुआ करते थे। वही संजय सेठ जिन्हें 2016 में समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा भेजा और वही संजय सेठ जो बाद में पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी में पहुंचे और 2024 में भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवार बने। वहीं संजय सेठ पर जिन पर समय समय पर बेशकीमती जमीनों को हड़पने के आरोप लगे। वहीं सजंय सेठ जिनका नाम लखनऊ के साड़ी कांड में आया। संजय सेठ पर आरापों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसे छापने के लिए अखबार के पन्ने कम पड़ जाएंगे।

जेपीएनआईसी की बदहाली पर 4PM के संपादक संजय शर्मा की पीआईएल ने मचा दिया था हड़कंप

लखनऊ स्थित जेपीएनआईसी को लीज पर दिए जाने के फैसले ने एक बार फिर सरकारी संपत्तियों के इस्तेमाल और उनके प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे मामले में 4PM के संपादक संजय शर्मा की भूमिका खास तौर पर चर्चा में रही। उन्होंने अधिवक्ता मोहम्मद हैदर के माध्यम से जनहित याचिका दाखिल कर जेपीएनआईसी से जुड़े फैसलों और उनकी प्रक्रिया पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी। संजय शर्मा की ओर से दाखिल पीआईएल के बाद इस मुद्दे ने व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का रूप लिया। पूरी व्यवस्था पर सवाल उठे। जेपीएनआईसी की बदहाली पर कोर्ट सख्त हुआ और उसने सरकार से जवाब मांगा। हलचल हुई और यह मुद्दा जनता के दरबार में पहुंचा और विमर्श का कारण बना। इस मामले में संजय शर्मा की पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा सकती है क्योंकि उन्होंने सवालों को केवल सार्वजनिक मंच पर उठाने तक सीमित नहीं रखा बल्कि उन्हें न्यायपालिका के सामने भी रखा। यही वजह है कि समर्थकों की नजर में वह ऐसे पत्रकार के तौर पर उभरते हैं जिसने सत्ता और प्रभावशाली फैसलों के सामने सवाल पूछने का जोखिम उठाया। जेपीएनआईसी प्रकरण का अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और आधिकारिक जांच से ही तय होगा लेकिन इतना जरूर है कि इस मुद्दे को अदालत की चौखट तक पहुंचाने में संजय शर्मा की पीआईएल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जवाब आया लीज के तौर पर

अब योगी सरकार ने इस सवाल का नया जवाब दिया है। जिस इमारत पर सरकार सैकड़ों करोड़ रुपये बहा चुकी हो उसे 30 साल के लिए निजी हाथों में चलाने के लिए दे दिया जाए। कैबिनेट ने जेपीएनआईसी को वृंदावन बॉटलर्स और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉट्र्स के कंसोर्टियम को लीज पर देने का एलान कर दिया है। सरकार का कहना है कि इससे एलडीए को करीब 831 करोड़ रुपये मिलेंगे, निजी ऑपरेटर अधूरे काम को अपने खर्च से पूरा करेगा और सरकार पर आगे का बोझ नहीं आएगा।

सरकार या फिर दुकानदार?

अखिलेश यादव ने सरकार के इस फैसले पर हमला बोलते हुए सरकार को सरकार या दुकानदार तक कह दिया है और जेपीएनआईसी को निजी हाथों में देने का विरोध किया है। वही सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सवाल तैर रहे है कि अगर यह परियोजना इतनी महत्वपूर्ण थी तो इसे इतने वर्षों तक बंद क्यों रहने दिया गया? और अब जब इसे खोला जा रहा है तो तीस साल के लिए निजी संचालन क्यों? कौन सा मॉडल चुना गया? किस आधार पर चुना गया? किसने बोली लगाई? कितनी बोलियां आईं? सबसे ऊंची बोली कितनी थी? और जिस कंपनी को संचालन मिला है उसके साथ सरकार का आर्थिक समझौता क्या है? सरकार के मुताबिक तीन कंपनियों/कंसोर्टियम ने बोली लगाई थी और सबसे ऊंची बोली वाले कंसोर्टियम का चयन हुआ।

सवालों का जवाब नहीं मिला

जेपीएनआईसी कोई निजी बिल्डिंग नहीं है। यह जनता की जमीन पर बनी सरकारी संपत्ति है। यह उस सरकार की परियोजना थी जिसने इसे लखनऊ की पहचान बनाने का सपना दिखाया। फिर सरकार बदली योगी आदित्यनाथ सत्ता में आए। और जेपीएनआईसी का सपना सपना ही रह गया। परिसर वर्षों तक बंद रहा इमारत खड़ी रही खर्च हो चुका था काम अधूरा रहा और जनता इंतजार करती रही। यही वह दौर था जब इस परियोजना को लेकर सवाल अदालत तक पहुंचे। जेपीएनआईसी को लेकर 4पीएम के संपादक संजय शर्मा द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। लंबे समय बाद सरकार ने समाधान निकाला है कि इसे निजी हाथों में दे दो। सरकार का तर्क है कि निजी ऑपरेटर बाकी काम पूरा करेगा संचालन करेगा और एलडीए को भुगतान करेगा। 30 साल की शुरुआती लीज के साथ विस्तार का प्रावधान भी है। सुनने में मॉडल शानदार लगता है। लेकिन राजनीति में असली सवाल हमेशा यह होता है कि यहां तक पहुंचने में जनता ने कितना दिया और आगे जनता को क्या मिलेगा? जनता पूछ रही है कि जिस संपत्ति पर पहले ही 800 करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुके हैं उसका मूल्यांकन क्या है? जमीन की कीमत कितनी है? और तीस साल के संचालन की आर्थिक कीमत कितनी है? निजी कंपनी को मिलने वाले संभावित राजस्व का अनुमान क्या है? सरकार को सालाना कितना मिलेगा? और निजी ऑपरेटर कितना कमाएगा? इन सवालों के जवाब जितने पारदर्शी होंगे लीज उतनी ही विश्वसनीय होगी। वरना सवाल उठेंगे। और सवाल इसलिए भी उठेंगे क्योंकि यह कोई साधारण सरकारी भवन नहीं है। यह लखनऊ की जमीन पर खड़ी उस राजनीतिक विरासत का स्मारक है जिसे पहले समाजवादी सरकार ने बनाया और अब भाजपा सरकार निजी संचालन के हवाले कर रही है।

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