तीखी बहस के बाद SC ने सुना दिया चौंकाने वाला फैसला, सरकार पर गिरी गाज

सुप्रीम कोर्ट में ईडी बनाम आई-पैक रेड मामले की सुनवाई सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह इस बात का आईना थी कि किस तरह जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या ईडी पर इस बार भारी पड़ गई ममता बनर्जी? क्या चुनाव आते ही ममता के दफ्तर में घुसना ईडी को भारी पड़ गया? हर बार जब भी सिसी राज्य में चुनाव आता है तो सरकार के पिंजरे में बंद एजेंसियां उस राज्य में छापा मारने पहुंच जाती हैं। लेकिन लगता है कि इस बार मोदी सरकार का ईडी वाला दांव इस बार उस पर भारी पड़ा है।

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में आज एक ऐसा मामला देखने को मिला जो किसी हिंदी फिल्मों से कम नहीं था। हिंदी फिल्मों में जिस तरह से दिखाया जाता है कि दो वकीलों के बीच इतनी तीखी बहस हो जाती है कि बीच में जज को हस्ताक्षेप करना पड़ जाता है। आज ठीक वैसा ही कुछ सीन सुप्रीम कोर्ट में देखने को मिला जब ईडी बनाम आई-पैक रेड मामले की सुनवाई हुई। एक तरफ थे सरकार के वफादार तुषार मेहता तो दूसरी ओर से देश के सबसे बड़े वकील कपिल सिब्बल।

सुप्रीम कोर्ट में ईडी बनाम आई-पैक रेड मामले की सुनवाई सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह इस बात का आईना थी कि किस तरह जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। अदालत के भीतर जो बहस हुई, उसने साफ कर दिया कि यह मामला अपराध से ज्यादा राजनीति से जुड़ा है, और निशाने पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस है। ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दावा किया कि ईडी रेड के दौरान ममता बनर्जी का दखल “चौंकाने वाला” था। उन्होंने सवाल उठाया कि वहां ऐसा क्या छिपाने के लिए था कि मुख्यमंत्री को पूरी पुलिस फोर्स के साथ खुद जाना पड़ा। यह बयान अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। किसी राज्य की मुख्यमंत्री अगर अपने ही राज्य में, अपनी ही पार्टी से जुड़े दफ्तर में जाती हैं, तो इसे “दखल” बताना दरअसल एक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है। वहीं ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस दावे को तुरंत खारिज किया।

उन्होंने साफ कहा कि आई-पैक का दफ्तर टीएमसी दफ्तर का ही हिस्सा है। उन्होंने सबसे अहम सवाल उठाया कि जब चुनाव चल रहे हों, तब ऐसी रेड की क्या जरूरत थी। यह वही सवाल है जो आम जनता भी पूछ रही है। महीनों तक शांत रहने वाली ईडी चुनाव आते ही अचानक इतनी सक्रिय क्यों हो जाती है? कोर्ट रूम में कपिल सिब्बल और तुषार मेहता के बीच तीखी बहस हुई। बहस इतनी तेज हो गई कि जस्टिस मिश्रा को हस्तक्षेप करना पड़ा और कहना पड़ा कि “यहां हंगामा मत कीजिए।” यह दिखाता है कि मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। ईडी ने कोलकाता हाई कोर्ट की सुनवाई का भी हवाला दिया और कहा कि वहां हालात इतने खराब हो गए कि मुख्य न्यायाधीश को यह आदेश देना पड़ा कि सिर्फ संबंधित वकील ही अदालत में मौजूद रहेंगे। तुषार मेहता ने कहा कि वहां हंगामा हुआ। कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि वे भी वहां थे। फिर से बहस हुई और कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम से साफ दिखता है कि ईडी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि टीएमसी और ममता सरकार न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल रही हैं। लेकिन सिब्बल और सिंघवी जैसे वरिष्ठ वकीलों ने हर बार तथ्यों के आधार पर जवाब दिया।

सुप्रीम कोर्ट में ईडी की ओर से तुषार मेहता और एएसजी राजू पेश हुए, जबकि ममता बनर्जी और डीजीपी की ओर से कपिल सिब्बल और कल्याण बनर्जी, और आई-पैक की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। यानी एक तरफ केंद्रीय जांच एजेंसी थी और दूसरी तरफ एक निर्वाचित राज्य सरकार, एक राजनीतिक पार्टी और एक पेशेवर चुनावी संस्था।तुषार मेहता ने दावा किया कि ईडी अब तक 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि वसूल कर चुकी है और यह पैसा अपराध के पीड़ितों को दिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि इस मामले का उस आंकड़े से क्या लेना-देना है? जब मुद्दा आई-पैक रेड की टाइमिंग और तरीके का है, तो बार-बार बड़ी रकम का जिक्र करना सिर्फ माहौल बनाने की कोशिश लगती है। मेहता ने यह भी कहा कि एक याचिकाकर्ता के खिलाफ मुख्यमंत्री और पुलिस ने तीन एफआईआर दर्ज की हैं और उन्हीं एफआईआर के आधार पर सीसीटीवी फुटेज हटाई गई। लेकिन इन आरोपों का आधार क्या है, यह साफ नहीं किया गया। आई-पैक रेड पर कपिल सिब्बल ने विस्तार से बताया कि 2021 में टीएमसी और आई-पैक के बीच एक औपचारिक अनुबंध हुआ था।

आई-पैक पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रबंधन का काम करता है। यह कोई छुपी हुई बात नहीं है। ईडी को यह सब पहले से पता था। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने पूछा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आई-पैक कराता है या निर्वाचन आयोग। सिब्बल ने साफ किया कि चुनाव आयोग चुनाव कराता है, लेकिन राजनीतिक दल अपनी रणनीति खुद बनाते हैं और आई-पैक जैसे संस्थान इसमें मदद करते हैं। यह कोई अपराध नहीं है। सिब्बल ने बताया कि आई-पैक के पास पार्टी से जुड़ा काफी डेटा होता है। ईडी को यह भी पता था। इसके बावजूद चुनाव के बीच रेड की गई। उन्होंने पूछा कि कोयला घोटाले में आखिरी बयान 24 फरवरी 2024 को दर्ज हुआ था। उसके बाद ईडी महीनों तक क्या कर रही थी? चुनाव आते ही अचानक इतनी तेजी क्यों दिखाई गई? यह सवाल सिर्फ कोर्ट का नहीं, पूरे देश का है। अगर मामला इतना गंभीर था, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? चुनाव के बीच ही क्यों? सिब्बल ने कहा कि अगर ईडी के हाथ पार्टी का रणनीतिक डेटा लग जाता, तो टीएमसी चुनाव कैसे लड़ती? यह लोकतंत्र में सीधा हस्तक्षेप होता। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते ममता बनर्जी को वहां जाने का पूरा अधिकार था।

ईडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सभी डिजिटल उपकरण अपने साथ ले गईं। सिब्बल ने इसे झूठ बताया और कहा कि ईडी के अपने पंचनामा में इसका खंडन है। उन्होंने अदालत में पंचनामा दिखाया, जिसमें लिखा था कि दोपहर 12:05 बजे तक कोई जब्ती नहीं हुई थी। उन्होंने बताया कि प्रतीक जैन के लैपटॉप में चुनाव से जुड़ी जानकारी थी और मुख्यमंत्री ने सिर्फ वही लैपटॉप और अपना निजी आईफोन लिया था। इसके अलावा कुछ भी नहीं लिया गया। पंचनामा में यह भी लिखा है कि किसी तरह का कोई अवरोध नहीं हुआ। यह बहुत अहम बात है। जब ईडी खुद दस्तावेज में लिख रही है कि कोई बाधा नहीं हुई, तो फिर कोर्ट में आकर इतना हंगामा क्यों? जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर ईडी का इरादा जानकारी जुटाने का होता, तो वे सामग्री जब्त कर लेते। सिब्बल ने जवाब दिया कि जानकारी फोटो लेकर भी हासिल की जा सकती है।

जब्ती जरूरी नहीं होती। उन्होंने फिर दोहराया कि पंचनामा से साफ है कि आई-पैक कार्यालय या प्रतीक जैन के परिसर में कुछ भी गलत नहीं हुआ। ईडी की ओर से एएसजी राजू ने कहा कि मामला इतना गंभीर है कि इसकी जांच सीबीआई से होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि दस्तावेज जबरन उठाए गए और धमकी दी गई। लेकिन इन आरोपों का कोई ठोस सबूत सामने नहीं रखा गया।

दूसरी तरफ, ममता सरकार के वकील चाहते हैं कि मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में सुना जाए। ईडी इसे सुप्रीम कोर्ट में ही रखना चाहती है। इससे यह संदेश जाता है कि एजेंसी राष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को बड़ा बनाना चाहती है। अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि कोलकाता हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान खुद जांच एजेंसी ने कहा था कि सुनवाई टाल दी जाए क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है। यानी पहले हाई कोर्ट से पीछे हटना और फिर सुप्रीम कोर्ट में कहना कि हाई कोर्ट को सुनवाई नहीं करने दी गई, यह अपने आप में विरोधाभास है।कपिल सिब्बल ने फिर वही सवाल दोहराया कि जब 2024 से मामला ईडी के पास है, तो चुनाव से पहले रेड की क्या जरूरत थी? यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर मामला है और नोटिस जारी किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि वे इस बात से व्यथित हैं कि हाई कोर्ट को सुनवाई नहीं करने दी गई। सिब्बल ने कहा कि सुनवाई हुई है और तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।

इस पूरे मामले में एक बात बिल्कुल साफ है। ईडी और उसके वकील एक ऐसा नैरेटिव बनाना चाहते हैं, जिसमें ममता बनर्जी, टीएमसी और आई-पैक को संदिग्ध दिखाया जाए। दूसरी तरफ, सिब्बल और सिंघवी जैसे अनुभवी वकील दस्तावेज, कानून और तथ्यों के आधार पर यह दिखा रहे हैं कि रेड के दौरान कोई गैरकानूनी काम नहीं हुआ। आई-पैक एक पेशेवर संस्था है, जो राजनीतिक दलों को रणनीतिक सलाह देती है। उसके पास डेटा होना अपराध नहीं है। किसी पार्टी के पास अपनी योजनाएं और रणनीति होना लोकतंत्र का हिस्सा है। ममता बनर्जी का वहां जाना कोई असामान्य या चौंकाने वाली बात नहीं थी। एक मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख के तौर पर उनका वहां होना पूरी तरह स्वाभाविक था। ईडी के अपने ही कागज उसके आरोपों को कमजोर करते हैं। पंचनामा में साफ लिखा है कि कोई अवरोध नहीं हुआ, कोई जबरदस्ती नहीं हुई। इसके बावजूद बड़े-बड़े आरोप लगाए जा रहे हैं। यह मामला सिर्फ कानून का नहीं, लोकतंत्र का भी है। चुनाव के समय विपक्षी पार्टी से जुड़े दफ्तर पर रेड, फिर मुख्यमंत्री पर आरोप, और फिर मामले को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना, यह सब एक खास राजनीतिक पैटर्न की ओर इशारा करता है।

हालांकि इन सबके बावजूद जो बहस का नतीजा निकला वो बहुत चौंकाने वाला था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को बड़ी राहत दे दी. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ममता बनर्जी और बंगाल सरकार को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तीन फरवरी को करने की बात कही है. शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि घटना का सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखा जाएगा. इसके साथ ही ईडी के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को अगली सुनवाई तक स्थगित रखने का आदेश दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है कि ईडी और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई में क्षेत्रीय पुलिस हस्तक्षेप कर रही है.

संविधान हरेक व्यवस्था को स्वतंत्र तरीके से काम करने की छूट देता है. ऐसे में एक राज्य की एजेंसी या पुलिस को इस तरह की गतिविधि करने की छूट नहीं दी जा सकती. साथ ही अदालत ने कहा कि स्थितियां और बिगड़ने और कानून का राज खत्म हो जाएगा. किसी भी केंद्रीय एजेंसी को किसी पार्टी के चुनावी कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. लेकिन सही तरीके से किसी गैरकानूनी गतिविधि के खिलाफ एक्शन ले सकती है. मामले की अगली सुनवाई तीन फरवरी को होगी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस कमिश्नर, DGP को नोटिस जारी किया है जिनसे दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा गया है. पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस को सभी सीसीटीवी समेत अन्य डिवाइस व दस्तावेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया है. इस पूरे मामले ने एक बार फिर दिखा दिया कि चुनावी मौसम में जांच एजेंसियों की सक्रियता सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राजनीति का रंग भी ले लेती है। सुप्रीम कोर्ट की राहत के बावजूद ED और ममता बनर्जी पर सियासी दबाव बना रहेगा। अब नजर 3 फरवरी की सुनवाई पर टिकी है।

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