नीतीश के इशारों पर 9 विधायक मारेगी पालटी? बीजेपी-कांग्रेस के लिए बुरी खबर!
बिहार में 9 ऐसे विधायक हैं जो नीतीश कुमार के इशारों बड़ा खेला करने जा रहे हैं जिससे न सिर्फ भाजपा को बल्कि कांग्रेस को भी बराबर का झटका लगने वाला है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या बिहार में कुछ बड़ा होने जा रहा है? ये सवाल काफी लंबे समय से बिहार में उठ रहा है। लेकिन ताजा घटनाक्रम इशारा कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में बिहार विधानसभा का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है. और इसके मुख्य किरदार वो 9 विधायक होने वाले हैं जो पूरा गेम पलटकर रख सकते हैं। बिहार में 9 ऐसे विधायक हैं जो नीतीश कुमार के इशारों बड़ा खेला करने जा रहे हैं जिससे न सिर्फ भाजपा को बल्कि कांग्रेस को भी बराबर का झटका लगने वाला है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की प्रचंड जीत के बाद ऐसा लग रहा था कि अब राज्य में राजनीतिक स्थिरता रहेगी, सरकार मजबूत है और विपक्ष बिखर चुका है। लेकिन महज दो महीने के भीतर ही बिहार की राजनीति फिर से उथल-पुथल की ओर बढ़ती दिख रही है। सत्ता के गलियारों में दलबदल की चर्चाएं तेज हो चुकी हैं, गठबंधन के भीतर वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है और विपक्ष की हालत और भी कमजोर होती जा रही है। कड़ाके की ठंड के बीच बिहार का सियासी पारा अचानक तेज़ हो गया है। एक तरफ बीजेपी और जदयू के बीच नंबर वन बनने की होड़ लगी हुई है, तो दूसरी तरफ उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी RLM में फूट पड़ती दिख रही है। इसी बीच कांग्रेस के लिए बिहार से सबसे बुरी खबर सामने आई है।
चर्चा है कि कांग्रेस के सभी छह विधायक नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के संपर्क में हैं। अगर ये विधायक पाला बदलते हैं तो 243 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस का नामोनिशान तक नहीं बचेगा। दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि कांग्रेस के सभी छह विधायक मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, अभिषेक रंजन, आबिदुर रहमान, मोहम्मद कामरुल होदा और मनोज बिस्वान जदयू नेतृत्व के संपर्क में हैं। सबसे खास बात ये है कि कांग्रेस पार्टी की ओर से हाल ही में पटना स्थित सदाकत आश्रम में आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज रखा गया था जिससे इन 6 विधायकों ने दूरी बना ली थी।
इतना ही नहीं, 8 जनवरी को प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम द्वारा बुलाई गई मनरेगा बचाओ अभियान की बैठक में भी कोई विधायक नहीं पहुंचा। जदयू के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि कांग्रेस विधायक अपनी पार्टी की कार्यप्रणाली से बेहद नाराज हैं और उनका जदयू में शामिल होना अब बस कुछ ही दिनों की बात है। वहीं कांग्रेस नेतृत्व इन खबरों को भ्रामक और राजनीतिक रूप से प्रेरित बता रहा है, लेकिन विधायकों की लगातार गैरमौजूदगी कई सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी, संगठनात्मक बैठकों में शामिल न होना और नीतीश कुमार के करीबियों से बढ़ते संपर्क इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है। अगर कांग्रेस के सभी छह विधायक जदयू में शामिल हो जाते हैं, तो बिहार विधानसभा में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। इससे विपक्षी महागठबंधन को बड़ा झटका लगेगा और नीतीश कुमार की ताकत और बढ़ जाएगी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
अब ये तो बात हो गई विपक्ष की लेकिन अब हम आपको बताते हैं कि एनडीए के भीतर भी हालात सामान्य नहीं हैं। गठबंधन के दो बड़े दल बीजेपी और जदयू के बीच नंबर वन बनने की खुली जंग चल रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि जदयू को 85 सीटें मिली थीं। यानी दोनों के बीच सिर्फ चार सीटों का फर्क है। अगर कांग्रेस के छह विधायक जदयू में आ जाते हैं, तो जदयू की संख्या 91 हो जाएगी और वह बीजेपी को पीछे छोड़कर विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। यही वजह है कि बीजेपी भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है। बीजेपी की नजर उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM के असंतुष्ट विधायकों पर है। पार्टी चाहती है कि किसी भी तरह उसकी संख्या 89 से ऊपर जाए और गठबंधन में उसका दबदबा बना रहे।
RLM के चार विधायकों में से तीन विधायक रामेश्वर महतो, माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह के बीजेपी के संपर्क में होने की खबरें सामने आ रही हैं। पार्टी में असंतोष की बड़ी वजह उपेंद्र कुशवाहा द्वारा अपने बेटे दीपक को कैबिनेट में शामिल करना बताया जा रहा है। कई नेताओं को लग रहा है कि पार्टी में परिवारवाद हावी हो गया है और पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। इसी नाराजगी का फायदा बीजेपी उठाने की कोशिश कर रही है।अगर RLM के तीन विधायक बीजेपी में चले जाते हैं, तो बीजेपी की संख्या 92 हो सकती है, जिससे वह जदयू से आगे निकल जाएगी। यानी दोनों दल एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए छोटे दलों के विधायकों पर डोरे डाल रहे हैं।
इसी सियासी खेल में एक और नाम तेजी से चर्चा में है, और वह है पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह का। आरसीपी सिंह कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते थे। लेकिन 2022 में उन्हें जदयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद वो प्रशांत किशोर की जन सुराज में शामिल हो गए थे। चुनाव से पहले वो उसी मंच पर नजर आए, जहां नीतीश कुमार के खिलाफ बातें होती थीं। लेकिन हाल ही में एक कुर्मी सम्मेलन में उनकी परोक्ष मौजूदगी ने नई अटकलों को जन्म दे दिया है। मंच पर भले ही वो सीधे नजर न आए हों, लेकिन उनके समर्थकों और उनके नाम के पोस्टरों ने यह संकेत दे दिया कि आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार के बीच बर्फ पिघल सकती है। उनकी जदयू में वापसी की चर्चाएं अब जोर पकड़ रही हैं। अगर आरसीपी सिंह की घर वापसी होती है, तो यह नीतीश कुमार के लिए बड़ा सियासी फायदा होगा। इससे पार्टी के अंदर पुराना संतुलन वापस आ सकता है और कुर्मी वोट बैंक को भी मजबूती मिलेगी।
विधानसभा में इस समय अन्य दलों के पास कुल छह सीटें हैं। इनमें AIMIM के पास पांच और बहुजन समाज पार्टी यानी BSP के पास एक सीट है। हालांकि एनडीए के पास भारी बहुमत है, लेकिन इसके बावजूद गठबंधन के भीतर सर्वोच्चता की लड़ाई और छोटे दलों में अंदरूनी कलह ने बिहार की राजनीति को अस्थिर बना दिया है। अगर कांग्रेस के छह विधायक जदयू में जाते हैं और RLM के तीन विधायक बीजेपी में चले जाते हैं, तो कुल नौ विधायक पाला बदल चुके होंगे। यही वो नौ चेहरे हैं जो बिहार की राजनीति का पूरा खेल बदल सकते हैं। एक झटके में कांग्रेस का सफाया, जदयू और बीजेपी की आपसी होड़ और छोटे दलों की कमजोरी, सब कुछ सामने आ जाएगा। नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा से चौंकाने वाली रही है। कभी बीजेपी के साथ, कभी विपक्ष के साथ और फिर से बीजेपी के साथ आकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं।
अब एक बार फिर ऐसा लग रहा है कि वे बीजेपी को नंबर गेम में मात देने की तैयारी कर रहे हैं। अगर जदयू सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है, तो गठबंधन के भीतर उसका दबदबा बढ़ जाएगा। फैसलों में उसकी बात ज्यादा चलेगी और बीजेपी को पीछे हटना पड़ सकता है। यही वजह है कि बीजेपी भी हर चाल का जवाब चाल से दे रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस की हालत सबसे खराब है। बिहार में पहले ही पार्टी कमजोर थी और अब अगर छह विधायक भी हाथ से निकल गए तो कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर चली जाएगी। न नेता बचेंगे, न विधायक, न कोई सियासी असर। कांग्रेस विधायकों की नाराजगी का कारण सिर्फ संगठनात्मक कमजोरी नहीं है, बल्कि नेतृत्व की कमी भी है। स्थानीय नेताओं को लगता है कि उनकी बात दिल्ली तक नहीं पहुंचती। फैसले ऊपर से थोप दिए जाते हैं और जमीन पर काम करने वालों को नजरअंदाज किया जाता है। यही वजह है कि विधायक अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए सुरक्षित ठिकाना ढूंढ रहे हैं, और उन्हें नीतीश कुमार की जदयू सबसे मजबूत विकल्प लग रही है। RLM में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं।
वहां असंतोष काकारण साफ है। उपेंद्र कुशवाहा द्वारा अपने बेटे को मंत्री बनाना कई नेताओं को खटक रहा है। पार्टी में यह संदेश जा रहा है कि मेहनत से ज्यादा रिश्ते अहम हैं। इससे नाराज विधायक अब बीजेपी की ओर झुक रहे हैं। बीजेपी भी यह अच्छी तरह समझती है कि सत्ता में रहकर नंबर गेम जीतना कितना जरूरी है। इसलिए वह हर मौके का फायदा उठाना चाहती है। इन सबके बीच बिहार की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां दोस्ती और दुश्मनी पल भर में बदल जाती है। यहां स्थायी कुछ भी नहीं है। जो आज साथ है, कल विरोध में हो सकता है। नीतीश कुमार के सामने मौका है कि वे जदयू को सबसे बड़ी पार्टी बनाएं और बीजेपी पर दबाव बढ़ाएं। बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह अपनी बढ़त बनाए रखे और गठबंधन में अपना वर्चस्व कायम रखे। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट अस्तित्व का है।
अगर विधायक चले गए, तो पार्टी का बिहार में भविष्य लगभग खत्म हो जाएगा। आरसीपी सिंह की वापसी, कांग्रेस विधायकों का संभावित दलबदल और RLM में टूट, ये तीनों घटनाएं मिलकर बिहार की राजनीति में बड़ा भूचाल ला सकती हैं। यह सिर्फ नंबरों की लड़ाई नहीं है, यह सत्ता, असर और भविष्य की लड़ाई है। जो इस खेल में पीछे रह गया, वह अगले कई सालों तक हाशिए पर चला जाएगा। इसलिए कहा जा रहा है कि बिहार में कुछ बड़ा होने जा रहा है। आने वाले दिनों में विधानसभा का चेहरा बदल सकता है। नई गिनती होगी, नए समीकरण बनेंगे और पुराने चेहरे नए खेमों में नजर आएंगे। अब देखना यह है कि ये चर्चाएं अफवाह बनकर रह जाती हैं या सच में नौ विधायक खेल पलट देते हैं। लेकिन एक बात तय है, बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है, और यहां कुछ भी संभव है।



