BMC मेयर के लिए छिड़ा जंग, अचानक मातोश्री में बढ़ गई हलचल!
बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, और शिंदे की शिवसेना के पास 29 सीटें हैं। दोनों मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार कर रहे हैं। लेकिन क्या ये इतना आसान है? क्या शिंदे और बीजेपी के बीच मेयर की कुर्सी को लेकर दरार पड़ सकती है?

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सपनों का शहर, जहाँ की सत्ता पर कब्जा करने के लिए दिल्ली से लेकर मुंबई तक के नेता एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं। लेकिन इस बार बीएमसी के गलियारों में कुछ ऐसा होने वाला है जिसकी स्क्रिप्ट शायद खुद मातोश्री या सागर बंगले में भी पूरी तरह नहीं लिखी गई है।
लॉटरी ने फैसला सुना दिया है कि मुंबई की अगली मेयर एक महिला होगी। लेकिन कौन? इसकी चर्चा और इंतजार हर तरफ है? क्या उद्धव ठाकरे के पास कोई ऐसा है जो मातोश्री की इज्जत को बचा सके या फिर सागर बंगले वाले फडणवीस की सत्ता आने जा रही है। ऐसे में ये खेल बड़ा हो गया है तो चलिए शुरू करते हैं। बीएमसी के इतिहास में 22 जनवरी की तारीख सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी। लॉटरी के जरिए मेयर पद का आरक्षण सामान्य वर्ग की महिला के लिए तय हुआ। इसका मतलब ये है कि अब किसी भी जाति या धर्म की महिला, जो पार्षद है, वो मुंबई की मेयर बन सकती है।
यहाँ असली खेल नंबर गेम का है। बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, और शिंदे की शिवसेना के पास 29 सीटें हैं। दोनों मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार कर रहे हैं। लेकिन क्या ये इतना आसान है? क्या शिंदे और बीजेपी के बीच मेयर की कुर्सी को लेकर दरार पड़ सकती है? क्योंकि दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीट) 65 सीटों के साथ घात लगाए बैठी है। उद्धव को बस एक मौके का इंतज़ार है, और वो मौका हो सकता हैकि एक ऐसा महिला चेहरा जिसे कोई भी पार्टी नकार न सके। मेयर की रेस में जो सबसे पहला और ताकतवर नाम गूँज रहा है, वो है तेजस्वी घोसालकर। तेजस्वी केवल एक पार्षद नहीं हैं, वो मुंबई की राजनीति का एक भावनात्मक चेहरा बन चुकी हैं। उनके पति अभिषेक घोसालकर की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। तेजस्वी ने न केवल अपनी हिम्मत बनाए रखी, बल्कि उद्धव गुट छोड़कर बीजेपी में आईं और चुनाव जीतकर अपनी ताकत दिखा दी।
कहा जा रहा है कि बीजेपी के लिए तेजस्वी सबसे सेफ कार्ड हैं। एक तो वो महिला हैं, ऊपर से उनके साथ जनता की सहानुभूति है। अगर बीजेपी तेजस्वी को आगे करती है, तो शिंदे गुट के लिए भी उन्हें मना करना मुश्किल होगा। लेकिन क्या तेजस्वी का शिवसैनिक बैकग्राउंड बीजेपी के पुराने नेताओं को हजम होगा? ये बड़ा सवाल है! हालांकि इस सबके बीच एक हंगामे जो मुंब्रा से शुरू हुआ। एआईएमआईएम की सहर शेख ने जीत के बाद हरे रंग का जो बयान दिया, उसने उन्हें विवादों में तो ला दिया, इससे मामला अचानक गर्म हो गया है। एक ओर जहां पार्टी के चीफ सहर को मैसेज कर बहादुर लड़की बता रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सहर शेख भी एफआईआर के झमेले में फंस चुकी हैं। हालांकि पुलिस का बयान आया है कि सहर और उनका परिवार माफी मांगने को तैयार हो गया है।
हालांकि इसके बाद बीएमसी में मुस्लिम मेयर के चांस बहुत ही कम होते दिख रहे है। वैसे आपको बात दें कि इस बार मुंबई में अलग-अलग पार्टियों के करीब 14 मुस्लिम पार्षद जीते हैं लेकिन मेयर के पद पर उनकी दावेदारी शायद ही दिखाई दे क्योंकि बीजेपी ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि उनको मराठी और हिंदू पार्षद मेयर चाहिए। इसी रास्ते पर एकनाथ शिंदे भी हैं लेकिन असली सस्पेंस उद्धव गुट की ओर बना हुआ है कि वो क्या करने वाले हैं। खबर है कि उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी की एक सुलझी हुई और महिला लीडर का नाम आगे कर सकते हैं। क्योंकि उद्धव को पता है कि अगर उन्होंने किसी ऐसी महिला को आगे किया जो शिक्षित है, प्रोग्रेसिव है और जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष है, तो कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) का समर्थन तो उन्हें मिलेगा ही, साथ ही वे शिंदे गुट के कुछ विधायकों के मन में भी हलचल पैदा कर सकते हैं। लेकिन ये चेहरा कौन होगा इसकी तलाश तेज हो गई है, लेकिन उद्धव की रणनीति इसे आखिरी वक्त तक गुप्त रखने की है। इमसे धनश्री कोलगे का नाम अंदरखाने में तय होना बताया जा रहा है।
ये भी कहा जा रहा है कि आगामी चुनावों के दृष्टिगत सकीना शेख पर दांव खेल सकती है हालांकि अभी इन दोनों नामों पर कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। वैस फिलहाल तेजस्वी घोसालकर जैसा हमने बताया, ये सबसे प्रबल दावेदार हैं। सहानुभूति और बीजेपी की ताकत इनके साथ है। दावेदारों में नंबर दो पर धनश्री कोलगे का नाम आ रहा है। उद्धव ठाकरे की भरोसेमंद सिपहसालार हैं अगर महाविकास अघाड़ी को मौका मिला, तो धनश्री का नाम सबसे ऊपर होगा। तीसरे नंबर पर शीतल म्हात्रे का नाम सामने आया है। अगर शिंदे गुट को मौका मिलता है तो इनकी किस्तम चमक सकती है। अइसके अलावा बीजेपी अलका केरकर, ऋतु तावड़े, राजश्री शिरवाडकर, राजश्री शिरवाडकर और आशा मराठे के नाम पर भी मंथन कर रहा है। पिछले दिनों एआईएमआईएम नेता वारिस पठान ने सार्वजनिक रूप से मांग की है कि मुंबई में एक बुर्का पहनने वाली मुस्लिम महिला मेयर क्यों नहीं बन सकती। पार्टी के भीतर से सईदा फलक जिन्हें लेडी ओवैसीश् कहा जाता है, एक चर्चित चेहरा बनी हुई हैं।
इसके अलावा सकीना अयूब शेख, महजबीन अतीक अहमद, खैरुननिसा हुसैन, इरम सिद्दीकी , नसीमा जावेद जुनेजा व रुखसाना पारेख जैसी मुस्लिम लेडी की चर्चा है लेकिन लेकिन सत्ता के समीकरण भाजपा और गठबंधन का बहुमत को देखते हुए मेयर पद के लिए फिलहाल किसी मुस्लिम के नाम आगे आने की उम्मीद न के बराबर है।
इस बीच, सागर बंगले पर देवेंद्र फडणवीस की हलचल बढ़ गई है। फडणवीस जानते हैं कि बीएमसी की कुर्सी पर अगर बीजेपी का कब्जा नहीं हुआ, तो आगामी विधानसभा चुनावों में मैसेज गलत जाएगा। बीजेपी के पास पार्षद तो हैं, लेकिन क्या उनके पास ऐसा चेहरा है जो राज ठाकरे की मनसे और एकनाथ शिंदे को एक साथ रख सके? खबरें हैं कि फडणवीस अब उन निर्दलीय महिला पार्षदों को भी टटोल रहे हैं जो ऐन वक्त पर बाजी पलट सकती हैं। ऐसे में ये भी हो सकता है कि फडणवीस कोई ऐसा सरप्राइज नाम लाएंगे जो फिलहाल किसी लिस्ट में नहीं है?
जिस तरह से एकनाथ शिंदे ने जीत के बाद अचानक अपने पार्षदों को होटल ताज में बंद कर दिया था और दावा किया जाता है कि उनको एफिडेविट और डॉक्यूमेंट जमा करने के बाद उनको छोड़ा गया है, ऐसे में कहीं न कहीं दाल में कुछ भंयकर काला बताया जा रहा है। वैसे भी कल्याण डोंबिवली में एकनाथ शिंदे ने जो कुछ किया है वो अपने एक अलग खेल है। यहां एकनाथ शिंदे ने बीजेपी का साथ छोड़कर राज ठाकरे के साथ मिलकर अपना मेयर बना लिया है लेकिन अगर बीएमसी में ऐसा होता है तो ये किसी बड़े खेल से कम नहीं होगा।
बीएमसी में बीजेपी को अपना मेयर बनाने के लिए कम से कम 25 पार्षदों की जरुरत है और एकनाथ शिंदे के बाद 29 पार्षद हैं। अगर एकनाथ शिंदे कल्याण डोंबिवली का काम करते हैं तो ऐसे में बीजेपी के बड़ी मुश्किल हो जाएगी लेकिन उद्धव गुट का खेल बढ़ जाएगा। वैसे उद्धव के लिए बीएमसी उनकी इज्जत की लड़ाई है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे केवल हिंदू वोटों पर नहीं, बल्कि मुंबईकर की एकता पर चुनाव लड़ेंगे। यही वजह है कि उनकी पार्टी की एक एक सेकयुल्सर महिला पार्षद ढूंढ रही है। ये कार्ड खेलकर उद्धव बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड को सेक्युलर मुंबई कार्ड से मात देना चाहते हैं।
ऐसे में साफ है कि बीएमसी की ये जंग अब केवल राजनीति नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन गई है। एक तरफ मातोश्री में हलचल बढ़ी है तो दूसरी ओर बीजेपी भी पूरी तैयारी में हैं और एक नाथ शिंदे और उद्धव की मुलाकात पर फाइनल चर्चा बीएमसी में नया गुल खिला सकती है। क्या तेजस्वी घोसालकर बाजी मारेंगी? क्या उद्धव का सेक्युलर कार्ड सबको चौंका देगा? या फिर फडणवीस का कोई गुप्त प्लान बी कामयाब होगा?



