बजट की सुबह और साड़ी का संदेश: संसद में निर्मला सीतारमण की एंट्री पर नजरें

तेलंगाना के इकत से लेकर बिहार के मधुबनी तक, और अब तमिलनाडु की कांजीवरम... वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अलमारी दरअसल भारत के नक्शे की तरह है. ये साड़ियां याद दिलाती हैं कि बजट सिर्फ आंकड़ों, घाटे और जीडीपी का खेल नहीं है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: संसद भवन में बजट पेश करने पहुंचीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की एंट्री एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कोई भी तस्वीर बेवजह नहीं होती, और बजट के दिन तो वित्त मंत्री का पहनावा सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि एक ‘स्टेटमेंट’ माना जाता है।

जब पूरे देश की नजरें भारत के बही-खाते पर टिकी थीं, तब वित्त मंत्री ने अपने अंदाज़ से सबका ध्यान खींचा। गहरे गुलाबी रंग की कांजीवरम साड़ी, हाथ में देश का बजट और चेहरे पर सौम्य मुस्कान—उनका यह लुक कई संदेश देता नजर आया। सबसे ज्यादा चर्चा उनकी मैजेंटा कांजीवरम साड़ी को लेकर रही। सवाल यह उठने लगे कि आखिर इस रंग और साड़ी का क्या अर्थ है। बीते कुछ वर्षों में बजट के दिन अलग-अलग पारंपरिक साड़ियां पहनकर संसद पहुंचने वाली निर्मला सीतारमण ने अपने पहनावे के जरिए ‘वोकल फॉर लोकल’ की सोच को मजबूत किया है।

तेलंगाना के इकत से लेकर बिहार की मधुबनी और तमिलनाडु की कांजीवरम तक, उनकी साड़ियां न सिर्फ भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा को दर्शाती हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों और स्वदेशी उत्पादों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक बन चुकी हैं। इस तरह बजट के दिन निर्मला सीतारमण का पहनावा सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि नीति, परंपरा और संदेश का संगम बनकर सामने आता है।

कांजीवरम और ‘कट्टम’ का संगम
सबसे पहले बात बजट 2026 के इस खास लुक की. निर्मला सीतारमण ने आज गहरे गुलाबी यानी मैजेंटा रंग की कांजीवरम साड़ी पहनी है. रंगों के मनोविज्ञान में मैजेंटा रंग बहुत खास है. यह रंग शक्ति, गरिमा और संतुलन का प्रतीक है. यह रंग बताता है कि फैसले कड़े होंगे, लेकिन उनमें एक ठहराव होगा.

लेकिन जरा गौर से देखिए… यह साधारण सिल्क नहीं है. साड़ी पर सुनहरे भूरे रंग के चेक बने हैं, जिसे तमिल परंपरा में ‘कट्टम’ कहा जाता है. दक्षिण भारत में ‘कट्टम’ या चेक पैटर्न अनुशासन और व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है. शायद यह इशारा है कि वो अर्थव्यवस्था में भी एक अनुशासन लाना चाहती हैं.

साड़ी का बॉर्डर बैंगनी रंग का है जो इसे एक रॉयल और क्लासी लुक दे रहा है. इसके साथ उन्होंने गहरे रंग का शॉल और पीले रंग का स्वेटर पहना है. संसद में जाने से पहले एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई – राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पारंपरिक ‘दही-चीनी’ खिलाई. यह शगुन है किसी भी शुभ काम की शुरुआत का, भारत की उस परंपरा का जो हर घर में आज भी जिंदा है.

वोकल फॉर लोकल – बुनकरों को सलाम
लेकिन सवाल यह है कि कांजीवरम ही क्यों? वित्त मंत्री का चुनाव सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि देश के बुनकरों के लिए एक संदेश है. कांजीवरम को ‘साड़ियों की रानी’ कहा जाता है. शुद्ध शहतूत रेशम (Mulberry Silk) और भारी ज़री से बनी यह साड़ी तमिलनाडु की समृद्ध विरासत है. इस साड़ी को पहनकर निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर ‘वोकल फॉर लोकल’ का झंडा बुलंद किया है. वो बिना कुछ बोले देश को बता रही हैं कि भारत का असली खजाना हमारे बुनकरों के हुनर में है. उनकी यह सोच बताती है कि विकास का रास्ता आधुनिकता की ओर जाता है, लेकिन उसकी जड़ें हमारी संस्कृति में होनी चाहिए.

इतिहास के पन्नों से – कब क्या पहना?
यह पहली बार नहीं है, जब उनकी साड़ी चर्चा का विषय बनी है. चलिए आपको फ्लैशबैक में ले चलते हैं और देखते हैं पिछले कुछ सालों की ‘बजट फैशन डायरी’.

2019: अपने पहले बजट में उन्होंने गुलाबी रंग की ‘मंगलगीरी’ साड़ी पहनी थी. गुलाबी रंग नारी शक्ति और नई उम्मीद का प्रतीक था, जिसने ‘ब्रीफकेस’ की जगह ‘बही-खाते’ की नई परंपरा शुरू की.

2020: कोरोना काल से ठीक पहले, वो चमकदार पीले रंग की सिल्क साड़ी में. पीला रंग उम्मीद और ऊर्जा का रंग है, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य का प्रकाश अंधेरे को चीरता है.

2021: फिर आया 2021 का बजट, जहां उन्होंने पहनी तेलंगाना की खास पोचमपल्ली साड़ी. लाल और क्रीम रंग की यह साड़ी संकट के समय में दृढ़ संकल्प और साहस का संदेश दे रही थी.

2022: उस साल उन्होंने चुना रस्टी ब्राउन यानी कत्थई रंग. यह रंग स्थिरता को दर्शाता है, यानी मुश्किल वैश्विक हालातों में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती.

2023: लाल और काले रंग की टेंपल बॉर्डर वाली साड़ी. काला रंग, जिसे अक्सर शुभ कामों में टाला जाता है, उन्होंने उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ पहनकर रूढ़ियों को तोड़ा.

2025: और पिछले साल की वो तस्वीर तो आपको याद ही होगी – बिहार की मधुबनी पेंटिंग वाली ऑफ-व्हाइट साड़ी. इसे पद्मश्री दुलारी देवी ने खुद डिजाइन किया था. वो सिर्फ एक साड़ी नहीं, बल्कि लोक कला का सम्मान था.

समृद्ध भारत की तस्वीर

तेलंगाना के इकत से लेकर बिहार के मधुबनी तक, और अब तमिलनाडु की कांजीवरम… वित्त मंत्री की अलमारी दरअसल भारत के नक्शे की तरह है. ये साड़ियां याद दिलाती हैं कि बजट सिर्फ आंकड़ों, घाटे और जीडीपी का खेल नहीं है. यह बजट उस बुनकर का है जो कांचीपुरम में धागा पिरोता है, उस कलाकार का है जो मधुबनी में रंग भरता है, और उस आम आदमी का है जो तरक्की की उम्मीद करता है. मैजेंटा और गोल्ड के इस लिबास में, वित्त मंत्री ने सिर्फ बजट नहीं पेश किया, बल्कि एक आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत की तस्वीर भी पेश की है.

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