सरकार ने आम जनता को दी महंगाई की एक और चोट

- साइलेंट अटैक : 10 दिन में तीसरी बार बढ़े ईंधन के दाम
- जनता को उबालो मत धीरे धीरे पकाओ वाली नीति पर अमल
- कांग्रेस का एक्स पर बयान मोदी सरकार जनता को ही लूटने में लगी है
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश में एक बार फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सरकार ने बढ़ोत्तरी का एलान किया है। इस बार सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमतों में 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल की कीमतों में 91 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी की है। पिछले 10 दिनों से ईंधन की कीमतों को तीन पर बढ़ाया जा चुका है जिससे लगभग में लगभग 5 रुपए प्रति लीटर का इजाफा हुआ है। सरकार जानती है कि अगर एक झटके में 10 रुपए बढ़ा दिए तो देशभर में हंगामा मच जाएगा। इसलिए जनता को उबालो मत, धीरे धीरे पकाओ वाली नीति अपनाई जा रही है। सुबह तेल कंपनियां नया झटका दे देती है और शाम तक टीवी चैनलों पर दूसरे मुद्दों का शोर शुरू हो जाता है। जनता अगली सुबह फिर लाइन में खड़ी होकर वही महंगा पेट्रोल भरवाती है और सत्ता को भरोसा हो जाता है कि देश अब विरोध नहीं करता सिर्फ सहन करता है।
महंगाई की असली चेन रिएक्शन
सरकार और तेल कंपनियां अक्सर पेट्रोल-डीजल के दामों को एक सामान्य आर्थिक प्रक्रिया बताती हैं। लेकिन सच यह है कि ईंधन की कीमत सिर्फ गाड़ी चलाने का खर्च नहीं बढ़ाती बल्कि पूरे बाजार की रीढ़ हिला देती है। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो सब्जी महंगी होगी। ट्रक का किराया बढ़ेगा तो सीमेंट और सरिया महंगे होंगे। डीजल बढ़ेगा तो खेती की लागत बढ़ेगी। यानी पेट्रोल पंप पर लगी आग सीधे रसोई तक पहुंचती है। यही वजह है कि आम आदमी को सिर्फ तेल नहीं पूरी जिंदगी महंगी महसूस होने लगती है। लेकिन सरकार की तरफ से हर बार वही पुराना तर्क दिया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम नीचे आते हैं तब जनता को राहत क्यों नहीं मिलती? देश की विपक्षी पार्टियां लगातार आरोप लगा रही हैं कि सरकार तेल कंपनियों के हितों की ज्यादा चिंता करती है। कांग्रेस ने एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि दुनिया भर की सरकारें जनता को राहत देने में लगी हैं जबकि भारत में जनता से ही वसूली की जा रही है। यह आरोप राजनीतिक जरूर है लेकिन जनता के मन में उठ रहे सवालों से मेल खाता है। लोग पूछ रहे हैं कि अगर टैक्स कम किए जाएं तो क्या सच में देश की अर्थव्यवस्था टूट जाएगी? या फिर सरकार को डर है कि कमाई का सबसे बड़ा जरिया कमजोर पड़ जाएगा? पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले टैक्स आज सरकारों की सबसे मोटी कमाई में शामिल हैं। यही कारण है कि हर सरकार विपक्ष में रहते हुए कीमतों पर हंगामा करती है और सत्ता में आते ही चुप हो जाती है।
सबसे ज्यादा पिस रहा है मध्यम वर्ग
गरीब को योजनाओं का सहारा मिल जाता है अमीर पर महंगाई का असर कम पड़ता है। लेकिन मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा दबाव झेलता है। उसकी सैलरी तय है खर्च अनियंत्रित हैं। ऑफिस जाने वाला कर्मचारी अब महीने का बजट पेट्रोल के हिसाब से बनाता है। छोटी दुकानों का मुनाफा ट्रांसपोर्ट लागत खा जाती है। यानी यह सिर्फ तेल का मुद्दा नहीं देश के आर्थिक संतुलन का सवाल बन चुका है। अगर ईंधन लगातार महंगा होता रहेगा तो आने वाले समय में जरूरी चीजें आम आदमी की पहुंच से और दूर होती जाएगी। यह सवाल अब सिर्फ विपक्ष नहीं देश की जनता भी पूछ रही है। क्या सरकार टैक्स कम करेगी? क्या तेल कंपनियों पर नियंत्रण होगा? क्या आम आदमी को राहत मिलेगी? या फिर धीरे-धीरे वाला यह खेल आगे भी जारी रहेगा? क्योंकि सच यही है कि जनता सब समझ रही है। धीरे-धीरे बढ़ती कीमतें अब धीरे-धीरे गुस्से में बदल रही हैं।
फिर पंपो पर बढ़ी भीड़
देश के तमाम हिस्सों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं, फ्यूल स्टेशनों में लोग अपनी गाडिय़ों की टंकी फुल करवाने के लिए जमा हो रहे हैं, बढ़ती भीड़ को देखकर लोगों में घबराहट और बढ़ रही है।
धीरे-धीरे वाली राजनीति का मनोविज्ञान
राजनीति में अब सिर्फ फैसले नहीं उनकी टाइमिंग और प्रस्तुति भी मायने रखती है। जनता को एक साथ बड़ा झटका देने के बजाय छोटे-छोटे झटकों में दर्द बांट दिया जाता है। इससे विरोध कमजोर पड़ता है। सोशल मीडिया पर दो दिन ट्रेंड चलता है फिर नया मुद्दा आ जाता है। यही कारण है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें अब सिर्फ आर्थिक नहीं मनोवैज्ञानिक खेल भी बन चुकी हैं। सरकार को पता है कि जनता अचानक हुए विस्फोट पर ज्यादा प्रतिक्रिया देती है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती परेशानी को अपनी किस्मत मानकर स्वीकार करने लगती है।
किसान खेत कम और चिंता ज्यादा जोत रहा है
क्या देश में सड़कें मुफ्त हो गईं? क्या गैस सिलेंडर सस्ता हो गया? क्या किसानों का डीजल सस्ता हुआ? क्या ट्रांसपोर्ट का खर्च कम हुआ? नहीं! उल्टा हर चीज महंगी होती चली जा रही है। दूध से लेकर सब्जी तक, बस किराए से लेकर ऑनलाइन डिलीवरी तक हर चीज के पीछे पेट्रोल-डीजल की आग लगी हुई है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया के जरिये इस महंगाई पर तंज कसा है कि महंगाई मैन पीएम मोदी ने 9 दिन में 5 रुपए बढ़ा दिए। सवाल सिर्फ कांग्रेस का नहीं है सवाल उस मध्यमवर्ग का है जो हर महीने सैलरी आने से पहले ही ईएमआई और पेट्रोल के बीच पिस जाता है। सवाल उस गरीब का है जो अब बाइक निकालने से पहले किलोमीटर नहीं जेब में पड़े नोट गिनता है। सवाल उस किसान का है जिसका ट्रैक्टर अब खेत कम और चिंता ज्यादा जोतता है।
इंडियन ऑयल ने दाम बढऩे पर दी अजीब सफाई
दाम बढऩे पर अब इंडियन ऑयल ने अपनी सफाई दी है। कंपनी ने कहा है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है, जो दिक्कतें कुछ जगहों पर दिख रही हैं वह अस्थायी समय के लिए है, इंडियन ऑयल के मुताबिक, इस वक्त कटाई का मौसम चल रहा है, जिसकी वजह से डीजल की मांग बढ़ी है, इसके अलावा कुछ प्राइवेट पेट्रोल पंपों पर दाम ज्यादा होने से वहां के ग्राहक सरकारी पंपों की तरफ शिफ्ट हो गए हैं। बड़े संस्थागत खरीदार भी इन दिनों पीएसयू पंपों से ईंधन ले रहे हैं क्योंकि बल्क सप्लाई के दाम अंतरराष्टï्रीय बाजार के हिसाब से काफी ऊंचे हैं। इन सब वजहों से कुछ खास इलाकों में मांग एकाएक बढ़ी है।




