नायरा एनर्जी ने सस्ता किया पेट्रोल, और क्यों हो गए गोल

- दूसरी कंपनियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही
- पेट्रोल 5 और डीजल 3 रुपये प्रति लीटर सस्ता
- कामर्शियल गैस सिलेंडर के भी घटाए दाम
- रिलायंस, इंडियन और भारत पेट्रोल समेत कई और कंपनियां कर रही है तेल का कारोबार
- महंगा पेट्रोल कर चुका है आम आदमी का जीवन अस्त व्यवस्त
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। आज 4PM किसी खबर के साथ नहीं बल्कि एक अहम सवाल के साथ पाठकों के बीच हाजिर है। एक ऐसा सवाल जिसे भारतीय मीडिया उठाना तो चाहता है लेकिन डर के कारण पूछ नहीं पा रहा और घूमा फिरा कर बात कर रहा है। वह सवाल पूरे देश के पेट्रोल पंपों पर खड़ा है।
सवाल यह है कि अगर एक कंपनी देश में अपने पेट्रोल पंप पर पांच रुपये और डीजल पर तीन रुपये प्रति लीटर तेल सस्ता कर सकती है तो फिर बाकी कि कंपनियां किसका इंतजार कर रही हैं? कच्चा तेल जब महंगा होता है तो पेट्रोल पंपों पर नया रेटबोर्ड बदलने में देर नहीं लगती। महंगाई बिना निमंत्रण के घर में घुस जाती है। लेकिन जब कच्चे तेल की कीमतें नरम पड़ती हैं तो इन कंपनियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती और उनके मुनाफे का मीटर चलता रहता है। आखिर राहत हमेशा सबसे आखिर में ही क्यों पहुचती है?
क्या बाजार के नियम सिर्फ एक दिशा में चलते हैं?
यह सवाल किसी एक कंपनी का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है जो महंगाई की खबर पर फुर्तीली और राहत की खबर पर सुस्त दिखाई देती है। देश का आम आदमी अर्थशास्त्र की मोटी किताब नहीं पढ़ता। उसे केवल इतना समझ आता है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो उसकी जेब पर असर तुरंत पड़ता है। लेकिन जब वही कीमत घटती है तो उसकी जेब तक राहत पहुंचने में इतना लंबा सफर क्यों तय करना पड़ता है? क्या बाजार के नियम सिर्फ एक दिशा में चलते हैं? क्या महंगाई एक्सप्रेस ट्रेन है और राहत पैसेंजर? आज नायरा एनर्जी ने कीमतें घटाकर पूरे ईंधन बाजार के सामने एक आईना रख दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि उसने दाम क्यों घटाए। सवाल यह है कि बाकी कंपनियां अपने उपभोक्ताओं को कब राहत देंगी? यदि लागत, कर, परिवहन और अन्य आर्थिक कारण अलग हैं तो उन्हें खुलकर बताया जाना चाहिए।
पारदर्शिता हमेशा विश्वास बढ़ाती है
उपभोक्ता को सिर्फ महंगाई की वजह समझाई जाए और राहत की वजह नहीं तो सवाल उठना लाजमी है। ईंधन केवल एक उत्पाद नहीं है। यही ट्रैक्टर चलाता है इसी से ट्रक चलाता है और बस के पहिये को भी यही घूमाता है। और यही देश की महंगाई का तापमान भी तय करता है। इसलिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सवाल सिर्फ तेल कंपनियों का व्यावसायिक निर्णय नहीं हो सकता यह करोड़ों परिवारों की रसोई किसानों की लागत व्यापारियों के खर्च और आम आदमी के मासिक बजट का ज्वलंत सवाल भी है। आज बहस का मुद्दा यह नहीं कि किसने कीमत घटाई बल्कि बहस का मुद्दा यह है कि जब राहत देना संभव है तो राहत सब तक कब पहुंचेगी? क्योंकि जनता का सवाल सीधा है जब महंगाई सबके लिए आती है तो राहत भी सबके लिए एक साथ क्यों नहीं आती?
होर्मुज को मत भूल जाना
कुछ दिन पहले तक पूरी दुनिया की निगाहें होर्मुज की ओर थी। आशंका थी कि यदि वहां से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। उसी आशंका के आधार पर महंगाई की चेतावनियां जारी हुई और फरवरी से अभी तक का समय आम आदमी के लिए बेचैनी भरा रहा हालांकि अब जब तनाव कम हुआ है आपूर्ति सामान्य बनी रही और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आयी है तो उपभोक्ता का सवाल भी उतना ही स्वाभाविक है। अगर होर्मुज के खतरे का असर हमारी जेब तक पहुंच सकता है तो होर्मुज के शांत होने का असर भी पहुंचना चाहिए या नहीं?
कौन है नायरा एनर्जी जिसने ईंधन बाजार में छेड़ दी नई बहस?
नायरा एनर्जी भारत की प्रमुख निजी तेल और रिफाइनिंग कंपनियों में से एक है। कंपनी का पुराना नाम एस्सार ऑयल था जिसे स्वामित्व परिवर्तन के बाद नायरा एनर्जी के नाम से जाना जाने लगा। गुजरात के वाडिनार में स्थित इसकी रिफाइनरी देश की बड़ी निजी रिफाइनरियों में शामिल है। देशभर में इसके 7 हजार से अधिक पेट्रोल पंप संचालित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भी नायरा एनर्जी ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। निजी क्षेत्र की कंपनी होने के बावजूद इसने खुदरा ईंधन बाजार में सरकारी तेल कंपनियों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दी है। आज कंपनी ने पेट्रोल की कीमत में 5 रूपये प्रति लीटर और डीजल में 3 रूपये प्रति लीटर की कटौती कर पूरे ईंधन क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी। यह कटौती ऐसे समय हुई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिली है। इसी अवधि में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी कमी दर्ज की गई।




