सेंसर ने रद्द कर दी संजय शर्मा की मूवी ‘सहिया’

  • सीबीएफसी फिल्मों को प्रमाणित कर रहा है या उन कहानियों को सेंसर कर रहा है जो उसे असहज लगती हैं?
  • संघर्षग्रस्त इलाके में आदिवासियों की प्रेम कहानी दिखाना नक्सलवाद का समर्थन माना जाएगा तो रचनात्मक स्वतंत्रता कहां बचेगी?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। एक पत्रकार ने कलम उठाई तो सत्ता परेशान हो गयी। सवाल पूछे तो मुकदमे आए आवाज बुलंद की तो चैनल पर कार्रवाई हुई लेकिन संजय शर्मा नहीं झुके। अब उसी संजय शर्मा ने कैमरा उठाया एक फिल्म बनाई सहिया और अपनी जिंदगी की जमा पूंजी दांव पर लगा दी तो फिल्म के सामने सेंसर बोर्ड की दीवार खड़ी कर दी गयी। दीवार भी अंबुजा सीमेंट जैसी मजबूत टूटी नहीं।
पहले फिल्म के सार्टिफिकेट को देने में देरी हुई सवाल पूछे तो एप्लीकेशन को सेंसर बोर्ड की कमेटी में भेज दिया गया और आज पता चला कि कमेटी ने सार्टिफिकेट देने से मना कर दिया और पिक्चर रिलीज को रद्द कर दिया है। इस खबर से समाज में सनसनी है और हर कोई सवाल पूछ रहा है कि आखिर यह क्या हो रहा है। लोकतंत्र में असहमति की आवाज को जवाब दिये जाने की परंपरा है लेकिन यहां तो उसे कुचला जा रहा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सहिया को प्रमाण पत्र क्यों नहीं मिला? असली सवाल यह है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जिससे सत्ता की नींद उडऩे का खतरा पैदा हो गया? देश में फिल्मों को प्रमाण पत्र देने वाली संस्था केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने संजय शर्मा की फिल्म सहिया को पब्लिक रिलीज का सार्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया है। बोर्ड की ओर से जारी निर्णय में फिल्म पर कई गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गयी हैं। कहा गया है कि फिल्म समाज के मूल्यों और मानकों के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाती हिंसा जैसी असामाजिक गतिविधियों का महिमामंडन या औचित्य साबित कर सकती है आदिवासी विरोधी और राष्ट्र विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकती है देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ तत्व रखती है राज्य की सुरक्षा तथा सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डाल सकती है। और अंत में बोर्ड ने सशस्त्र विद्रोह कार्यकर्ताओं और आंदोलन के कथित महिमामंडन तथा रोमांटिक चित्रण की आशंका भी जतायी है।

संजय शर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपना दर्द साझा किया

सेंसर बोर्ड द्वारा रिलीज प्रमाण पत्र देने से मना कर देने के बाद सहिया फिल्म के निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपना दर्द साझा किया और सेंसर बोर्ड से अपने सवालों के जवाब देने को कहा। सीबीएफसी द्वारा उठाये गये प्रश्नों का सिलसिलेवार जवाब देने क बाद संजय शर्मा ने ऐसे सवाल उठाये हैं जो सीधे व्यवस्था से टकरा रहे हैं। संजय शर्मा ने साफ कर दिया कि आगे की कार्रवाई के लिए आवेदन कर दिया गया है उन्हें उम्मीद है कि वहां से न्याय होगा यदि फिर भी फिल्म रिलीज के लिए अड़ंगा लगाया जाता है तो फिर वह हाईकोर्ट की शरण में जाएंगे।

पहला सवाल- 51 दिन क्यों?

सहिया फिल्म के निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने कहा है कि सहिया को प्रायोरिटी स्कीम के तहत प्रमाणन के लिए भेजा गया था और इसके लिए अतिरिक्त शुल्क भी दिया गया। लेकिन फिल्म की स्क्रीनिंग में लगभग 51 दिन लग गये। अब सवाल सीधा है जब निर्माता प्राथमिकता के लिए अतिरिक्त शुल्क दे रहा है तो प्राथमिकता आखिर है किस बात की? अगर फिल्म को देखने में भी वही इंतजार करना है जो सामान्य आवेदन में होता है तो फिर प्रायोरिटी स्कीम का मतलब क्या रह गया?

दूसरा सवाल- मोबाइल बाहर क्यों?

निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने प्रमाणन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा किया। उनका कहना है कि स्क्रीनिंग के बाद समिति से बातचीत के लिए बुलाए जाने पर उनसे मोबाइल फोन बाहर रखने को कहा गया। संजय शर्मा पूछते हैं क्यों? एक वैधानिक संस्था में फिल्म से जुड़े आधिकारिक विमर्श में निर्माता को रिकॉर्डिंग से दूर रखने का औचित्य क्या है? संजय शर्मा ने कहा कि इस सवाल का स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए उन्होंने कहा कि मैं कोई हवा में आरोप नहीं लगा रहा हूं। मेरा सीधा सवाल है कि एक आधिकारिक बातचीत के दौरान निर्माता को मोबाइल फोन साथ रखने से रोकने का औचित्य क्या है? उन्होंने कहा कि प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान हुई घटनाओं ने उनके मन में यह गंभीर आशंका पैदा की है कि सहिया को वह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया नहीं मिली जिसकी अपेक्षा हर फिल्म निर्माता को एक वैधानिक संस्था से करने का अधिकार है।

तीसरा सवाल- आदिवासी दिखाना अपराध कब हो गया?

निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने सवाल उठाया है कि क्या किसी आदिवासी गांव को पर्दे पर दिखाना नक्सलवाद का समर्थन है? क्या हिंसा के बीच फंसे सामान्य लोगों की पीड़ा दिखाना सशस्त्र आंदोलन का प्रचार है? क्या किसी कहानी की भौगोलिक पृष्ठभूमि ही उसकी विचारधारा तय कर देगी? और अगर जवाब हां है तो सवाल सिर्फ सहिया का नहीं रहेगा फिर भारतीय सिनेमा में संघर्षग्रस्त इलाकों की कहानियां कौन कहेगा?

चौथा सवाल- फिल्म दिखाना समर्थन कैसे हो गया?

निर्माता निर्देशक संजय शर्मा की दलील है कि किसी चीज को पर्दे पर दिखाना उसका समर्थन करना नहीं होता। अपराधी की कहानी दिखाना अपराध का समर्थन नहीं। आतंकवाद दिखाना आतंकवाद का प्रचार नहीं। हिंसा दिखाना हिंसा का महिमामंडन नहीं। उसी तरह नक्सल प्रभावित इलाके में रहने वाले सामान्य आदिवासी परिवारों की जिंदगी दिखाना नक्सलवाद का समर्थन कैसे हो सकता है?

पांचवां सवाल- फिल्मकार प्रमाणपत्र मांग रहा है या एहसान?

निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने दो टूक कहा कि फिल्मकार सीबीएफसी से कोई एहसान नहीं मांग रहा। मांग सिर्फ इतनी है कि प्रक्रिया निष्पक्ष हो पारदर्शी हो और समयबद्ध हो। क्योंकि फिल्म सिर्फ एक फाइल नहीं होती। उसमें निर्माता के करोड़ों रुपये होते हैं। कलाकारों की मेहनत होती है। तकनीशियनों का पसीना होता है संगीतकारों की मेहनत होती है डिस्ट्रीब्यूशन और प्रचार का पूरा कारोबार जुड़ा होता है। और रिलीज में देरी का मतलब सिर्फ कैलेंडर बदलना नहीं कभी कभी करोड़ों का नुकसान होता है।

कोर्ट की शरण में जाएंगे संजय शर्मा

निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने साफ कर दिया है कि सीबीएफसी के फैसले के खिलाफ अभ्यावेदन दिया गया है। उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई लेकिन अगर वहां से न्याय नहीं मिला तो अगला रास्ता हाईकोर्ट होगा। सहिया की रिलीज अभी रुकी है लेकिन बहस चल पड़ी है।

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