अपने ही बुने जाल में फंस गई बीजेपी !

  • जाति की लड़ाई सड़क पर आई
  • क्या बीजेपी की जातीय इंजीनियरिंग फेल हो रही है
  • मंत्री वर्सेज विधायक चरम पर अगड़ा, पिछड़ा हिंदू, मुस्लिम
  • सरकारों में सिस्टमेटिक नाराजगी का विस्फोट

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब लड़ाई बंद कमरों में नहीं बल्कि सड़कों पर उतर आयी है। जल संसाधन मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के काफिले को बीजेपी से चरखारी विधायक बृजभूषण राजपूत ने समर्थकों के साथ सड़क पर रोक लिया और हालात इतने बिगड़े कि पुलिस और विधायक समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक हाथापाई तक पहुंच गयी और सत्ता के भीतर की खदबदाहट कैमरों के सामने नंगी हो गई। यह कोई सामान्य विरोध नहीं था। यह कोई प्रशासनिक असंतोष नहीं था। यह बीजेपी की जातीय राजनीति में पड़ी दरार का लाइव टेलीकास्ट था। सवाल सीधा है क्या बीजेपी की जातीय इंजीनियरिंग फेल हो रही है?

आने वाले राजनीतिक तूफान का ट्रेलर

आरोप हैं कि सरकारों में जातीय संतुलन टिकट बंटवारा, नौकरशाही की हावी भूमिका और केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएं स्थानीय विधायकों को लगातार हाशिये पर धकेल रही हैंं। हाल फिलहाल ऐसी कई घटनाां घटित हुई हैं जिससे बीजेपी का अनुशान तार—तार हुआ है। बीजेपी का अनुशासन अब दबाव में दरकता दिख रहा है। अगर विधायक ही सरकार के मंत्री को घेर लें तो यह मान लेना चाहिए कि भीतर की दरारें अब भरने लायक नहीं रहीं। यह घटना एक चेतावनी है सत्ता अगर संवाद भूल जाए तो असंतोष सड़क पर उतरता है। और जब पार्टी के अपने लोग विरोध में खड़े हों तो विपक्ष को बोलने की जरूरत भी नहीं पड़ती। यह सिर्फ़ नाराजगी नहीं यह आने वाले राजनीतिक तूफान का ट्रेलर है।

नाराजगी लेगा कड़ी परीक्षा

लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह फुसफुसाहट चल रही थी कि सरकार और विधायकों के बीच की दूरी बढ़ रही है लेकिन अब यह फुसफुसाहट शोर में बदलती दिख रही है। जल संसाधन मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के काफिले को स्थानीय विधायकों द्वारा घेरना महज एक तात्कालिक गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उस सिस्टमेटिक नाराजगी का विस्फोट है जो महीनों से भीतर ही भीतर सुलग रही थी। विधायकों की मंत्रियों से शिकायतें नई नहीं हैं। इस घटना ने यह साफ़ कर दिया है कि अब विधायक खुलकर नाराजगी जाहिर करने लगे हैं। पहले शिकायतें बंद कमरों में होती थीं अब सड़क पर हैं कैमरे के सामने हैं और जनता के बीच हैं। यह सिर्फ एक मंत्री बनाम विधायक का मामला नहीं बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते अविश्वास का संकेत है।

विपक्ष ने भी साधा निशाना

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम पर कहा है कि बीजेपी के विधायक ने ही अपने ही मंत्री को बंधक बना कर सरकार के भीतर चल रही खींचतान असंतोष और अव्यवस्था को नंगा कर दिया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी इस असंतोष को लंबे समय से ढकने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि सवाल सिर्फ मंत्री के काफि ले को घेरने का नहीं है सवाल यह है कि जब सत्ता पक्ष के विधायक ही अपने मंत्री पर भरोसा नहीं कर रहे तो आम जनता क्या उम्मीद करे?

चुनावी गणित बिगडऩे वाला है?

बीजेपी जिस जातीय संतुलन को सोशल इंजीनियरिंग कहती आ रही है वह अब सोशल एक्सप्लोजन बनता दिख रहा है। कल तक विरोध बाहर था आज विरोध सरकार के भीतर है। यूजीसी के मुद्दे पर छात्रों और शिक्षकों का गुस्सा फूट पहले ही फूंट चुका है। अब मंत्रियों के खिलाफ विधायकों का सब्र टूट रहा है। और इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक समीक्षक लोध बनाम कुर्मी के फ्रें म से देखने में भी हिचक नहीं रहे हैं। स्वतंत्रदेव सिंह सिर्फ मंत्री नहीं हैं। वह कुर्मी समुदाय का बड़ा चेहरा हैं। और जिन विधायकों ने काफिला घेरा उनकी पहचान सिर्फ विधायक की नहीं जातीय प्रतिनिधि की भी है। यानी टकराव नीतियों का नहीं पहचान का है। बीजेपी ने सालों तक लोध, कुर्मी, ओबीसी को एक ही पंक्ति में खड़ा रखा। लेकिन अब वही पंक्ति टूटती दिख रही है। और जब सत्ता में बैठी पार्टी में जाति आपस में भिड़ जाए तो समझ लीजिए कि चुनावी गणित बिगडऩे लगा है।

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