राहुल गांधी का दावा कितना सही? जानिए OSD की नियुक्ति और अधिकारों का सच

राहुल के इस बयान के बाद सत्ता पक्ष ने कड़ा ऐतराज जताया और सदन में जमकर हंगामा हुआ. इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उस पद को चर्चा में ला दिया है

4पीएम न्यूज नेटवर्क: राहुल गांधी के OSD वाले बयान के बाद यह पद चर्चा में है. जानिए OSD (Officer on Special Duty) कौन होता है, उसकी नियुक्ति कैसे होती है, क्या अधिकार होते हैं और क्या वह किसी मंत्रालय के फैसले ले सकता है.

लोकसभा में एंटी पेपर लीक बिल पर बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बड़ा दावा किया कि शिक्षा मंत्रालय असल में मंत्री ने नहीं, बल्कि RSS ने चलाया और इसे चलाने वाला व्यक्ति असल में मंत्री के दफ्तर में बैठा OSD होता है. उन्होंने कहा कि पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा महज एक दिखावा था, क्योंकि नीतियां कहीं और से तय होती रहीं.

राहुल के इस बयान के बाद सत्ता पक्ष ने कड़ा ऐतराज जताया और सदन में जमकर हंगामा हुआ. इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उस पद को चर्चा में ला दिया है जिसका नाम आम बोलचाल में तो सुना जाता है, लेकिन इसका असली दायरा, नियुक्ति प्रक्रिया और अधिकार बहुत कम लोग जानते हैं OSD यानी Officer on Special Duty.

OSD का पद क्या होता है?

OSD भारत सरकार, राज्य सरकार, मंत्रियों या मुख्यमंत्रियों के कार्यालय में एक ऐसा अफसर होता है जिसे किसी खास काम, नीति या जिम्मेदारी के लिए नियुक्त किया जाता है. यह कोई स्थायी संवर्गीय पद (कैडर पोस्ट) नहीं है, बल्कि जरूरत के हिसाब से बनाया गया एक अस्थायी पद है.

इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौर से मानी जाती है, जब प्रशासनिक व्यवस्था में विशेष कार्यों के निपटारे के लिए ऐसे अफसर नियुक्त किए जाते थे. आज भी केंद्र और राज्य, दोनों स्तर पर मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों में OSD की नियुक्ति आम बात है.

OSD कैसे चुने जाते हैं, नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है?

OSD पद के लिए कोई सीधी सरकारी भर्ती परीक्षा नहीं होती. इसकी नियुक्ति कुछ तरीकों से होती है.

मौजूदा सरकारी अधिकारियों की डेप्युटेशन- ज्यादातर OSD पहले से ही IAS, IPS, IRS या PCS जैसी सेवाओं के अधिकारी होते हैं, या फिर किसी विभाग या सचिवालय में ग्रुप A/B स्तर पर कार्यरत रहते हैं. इन्हें उनके मूल विभाग से मंत्री या मुख्यमंत्री कार्यालय में डेप्युटेशन पर भेजा जाता है.

मंत्री या नेता के भरोसेमंद व्यक्ति के तौर पर नियुक्ति- कई OSD ऐसे भी होते हैं जो लंबे समय से संबंधित नेता की राजनीतिक टीम या चुनाव प्रबंधन का हिस्सा रहे हों और नेता के भरोसे के आधार पर उन्हें यह जिम्मेदारी दी जाती है.

नियुक्ति पत्र के जरिए औपचारिक रूप से पद दिया जाता है और आमतौर पर इनकी अवधि उस मंत्री या पदाधिकारी के कार्यकाल तक ही सीमित होती है.

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) का एक आधिकारिक मेमोरंडम भी मौजूद है, जो कि 19 अगस्त 2010 को जारी हुआ था. इसमें साफ किया गया है कि मंत्रियों के निजी स्टाफ में डिप्टी सेक्रेटरी स्तर और उससे ऊपर के OSD की नियुक्ति के लिए मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) की पूर्व मंजूरी अनिवार्य है.

वहीं, प्राइवेट सिक्रेटरी के पद पर नियुक्ति के लिए तो हर स्तर पर ACC की मंजूरी जरूरी बताई गई है. यह ज्ञापन इसलिए जारी करना पड़ा क्योंकि कई मंत्रालय और विभाग OSD की नियुक्ति पहले कर लेते थे और बाद में उसकी मंजूरी के लिए प्रस्ताव भेजते थे, जिस पर ACC ने आपत्ति जताते हुए सभी मंत्रालयों को भविष्य में इस निर्देश का पालन करने को कहा. यानी नियमों के मुताबिक OSD की नियुक्ति मंत्री की मर्जी भर से नहीं, बल्कि एक तय प्रशासनिक और मंजूरी की प्रक्रिया से होकर गुजरती है.

OSD का काम और अधिकार क्या हैं

OSD की भूमिका मंत्री के नीतिगत सलाहकार, प्रशासनिक समन्वयक और रणनीतिक प्रबंधक जैसी होती है. सामान्य तौर पर इनके कामकाज में मंत्री को नीतियों और योजनाओं पर इनपुट देना, विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से तालमेल बिठाना, मीडिया व जनसंपर्क की रणनीति तैयार करना, भाषण व नोट्स बनाना शामिल होता है. हालांकि, संवैधानिक और प्रशासनिक दृष्टि से अंतिम नीतिगत फैसला लेने का अधिकार मंत्री और संबंधित विभाग के सचिव स्तर के अधिकारियों के पास ही होता है.

OSD औपचारिक रूप से कोई सरकारी आदेश जारी नहीं कर सकता. वह सलाह देने, समन्वय बनाने और मंत्री तक जरूरी जानकारी पहुंचाने का काम करता है. इसीलिए OSD का प्रभाव अनौपचारिक रूप से बहुत अधिक हो सकता है, भले ही औपचारिक अधिकार सीमित हों.
OSD, PS और PA में क्या फर्क है?

तीनों पद मंत्री के कार्यालय से जुड़े होते हैं, लेकिन इनकी भूमिका अलग-अलग है. पर्सनल असिस्टेंट यानी PA मंत्री का शेड्यूल, बैठकें, फाइल मूवमेंट और दफ्तर का रोजमर्रा का कामकाज संभालता है. यह ज्यादातर ऑपरेशनल स्तर की जिम्मेदारी है.

प्राइवेट सिक्रेटरी आमतौर पर PA से वरिष्ठ होता है और मंत्री के कार्यालय के प्रशासनिक प्रबंधन तथा विभागीय समन्वय की जिम्मेदारी संभालता है. वहीं, OSD की भूमिका इन दोनों से अधिक नीतिगत और रणनीतिक मानी जाती है यह पद सीनियर और अधिक प्रभावशाली समझा जाता है, क्योंकि यह सीधे नीति-निर्माण और निर्णय-प्रक्रिया के करीब काम करता है.

राहुल गांधी का दावा और नियम

सरकारी नियमों के मुताबिक, संवैधानिक रूप से किसी मंत्रालय की नीतियों और निर्णयों की अंतिम जिम्मेदारी संबंधित मंत्री की ही होती है, न कि उसके कार्यालय में तैनात किसी OSD या सलाहकार की. OSD का पद प्रशासनिक ढांचे में सहायक और सलाहकार की भूमिका के लिए बना है, फैसला लेने की संवैधानिक शक्ति के लिए नहीं.

राहुल गांधी का यह कहना कि “मंत्री सिर्फ मुखौटा हैं और OSD मंत्रालय चलाते हैं”, एक राजनीतिक आरोप है जिसे उन्होंने शिक्षा मंत्रालय के संदर्भ में RSS के कथित प्रभाव से जोड़कर पेश किया. सत्ता पक्ष ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए इसे निराधार बताया और राहुल गांधी से इसके लिए सबूत मांगे.

मौजूदा सरकारी नियमों के हिसाब से देखा जाए तो OSD का पद, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानूनी और संवैधानिक रूप से मंत्री की जगह नहीं ले सकता, लेकिन यह जरूर सच है कि प्रशासनिक व्यवहार में कई बार भरोसेमंद OSD का असर मंत्री के फैसलों पर काफी गहरा होता है और यही वजह है कि यह पद अक्सर राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ जाता है.

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