Mirzapur Forest Fire: यूपी-एमपी बॉर्डर के जंगल में भड़की भीषण आग, रातभर सुलगते रहे पहाड़

मिर्ज़ापुर के ड्रमंडगंज वन क्षेत्र में यूपी-एमपी बॉर्डर के करनपुर और मड़वा धनावल जंगल में भीषण आग लग गई। तेज हवाओं के चलते आग रातभर फैलती रही। कई पेड़-पौधे जलकर राख हो गए, जबकि वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मिर्ज़ापुर के ड्रमंडगंज वन क्षेत्र में मंगलवार को लगी भीषण आग ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी। यूपी-मध्यप्रदेश सीमा से जुड़े करनपुर और मड़वा धनावल जंगलों में दोपहर के समय भड़की आग रातभर धधकती रही और बुधवार सुबह तक कई हिस्सों में उसका असर दिखाई देता रहा। तेज हवाओं के कारण आग ने देखते ही देखते जंगल के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि आग सीमावर्ती मध्यप्रदेश के जंगलों से बढ़ते हुए मिर्ज़ापुर के पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुंची। आग की भयावह लपटों ने जंगल के हरे-भरे पेड़ों और वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुंचाया है।

तेंदू, पलाश और बांस के जंगल जलकर राख

भीषण आग की चपेट में तेंदू, पलाश, नीम, अर्जुन, सलई, सिद्ध और बांस जैसे कई महत्वपूर्ण पेड़-पौधे आ गए। जंगलों में उठती लपटें दूर-दूर तक दिखाई देती रहीं। आग के कारण पहाड़ी इलाकों में धुआं फैल गया, जिससे आसपास के गांवों में भी दहशत का माहौल बन गया। ग्रामीणों के मुताबिक तेज हवा के चलते आग तेजी से पहाड़ के ऊपरी हिस्सों में फैलती चली गई। कई ग्रामीणों ने समय रहते वन विभाग को सूचना दी, लेकिन आरोप है कि देर रात तक विभाग की कोई टीम आग बुझाने मौके पर नहीं पहुंची।

वन्यजीवों पर मंडराया खतरा

जंगल में लगी आग का असर केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है। वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी बड़ा खतरा खड़ा हो गया है। आग की वजह से जंगली जानवर अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगल में रहने वाले छोटे जीव-जंतु और पक्षियों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है, लेकिन हर साल आग की घटनाओं के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है।

हर साल लगती है आग, फिर भी नहीं बन पाई ठोस रणनीति

ड्रमंडगंज वन क्षेत्र में आग लगने की घटनाएं नई नहीं हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि लगभग हर वर्ष गर्मियों में इसी तरह जंगल धधकते हैं। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह केवल संयोग है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी लापरवाही अथवा साजिश छिपी है। क्षेत्र में हर साल बड़े पैमाने पर पौधारोपण और वन संरक्षण के दावे किए जाते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में लाखों पौधे लगाने की बातें सामने आती हैं, लेकिन आग लगने के बाद वन क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

ग्रामीणों ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जंगलों की सुरक्षा के लिए वन क्षेत्राधिकारी, फॉरेस्ट गार्ड और वाचर तैनात किए जाते हैं, बावजूद इसके हर साल इतनी बड़ी आग लगना कई सवाल खड़े करता है। जब क्षेत्रीय वन अधिकारी ड्रमंडगंज से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ मिला। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी और बढ़ गई।

हर बार ग्रामीणों और चरवाहों पर क्यों फोड़ा जाता है ठीकरा?

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हर बार जंगल में आग लगने के बाद वन विभाग जिम्मेदारी से बचते हुए ग्रामीणों और चरवाहों पर आरोप लगा देता है। अक्सर यह कहा जाता है कि किसी ने बीड़ी या सिगरेट फेंक दी होगी, जिससे आग फैल गई। हालांकि ग्रामीणों का सवाल है कि जब हर साल ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो वन विभाग ने अब तक कोई प्रभावी रोकथाम व्यवस्था क्यों नहीं बनाई। लोगों का कहना है कि लगातार बढ़ती आग की घटनाओं के बीच अब केवल पुराने बहाने काम नहीं करेंगे, बल्कि जिम्मेदार एजेंसियों को जवाबदेही तय करनी होगी। फिलहाल जंगल के कई हिस्सों में नुकसान का आकलन किया जा रहा है और स्थानीय लोग प्रशासन से जल्द प्रभावी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

रिपोर्ट – संतोसग देव गिरी

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