Gen-Z के लिए उद्धव ने कह दी बड़ी बात, राहुल ने भी शाह को चिट्टी लिखकर कर दी बड़ी मांग

छत्रपति शिवाजी महाराज पार्क में तिरंगा विजय रैली मनाने के लिए जेनरेशन जेड की भारी भीड़ उमड़ी, जो युवाओं की एकता को प्रदर्शित करती है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मोदी सरकार एक बार फिर जनता के सामने घुटनो पर आ गई है। Gen-Z की एकता के आगे मोदी सरकार की मजबूरी देखने को मिली। जिस सरकार में ये कहा जाता था कि यहां इस्तीफे नहीं होते वाली शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है।

जिसके बाद सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है और नेताओं की लगातार प्रतिक्रिया भी सामने आ रही है। इसी बीच महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में शिवसेना यूबीटी और मनसे प्रमुख के नेतृत्व में तिरंगा विजय रैली का आयोजन किया गया. छत्रपति शिवाजी महाराज पार्क में तिरंगा विजय रैली मनाने के लिए जेनरेशन जेड की भारी भीड़ उमड़ी, जो युवाओं की एकता को प्रदर्शित करती है. रैली का मुख्य मुद्दा NEET पेपर लीक और अन्य परीक्षा संबंधी विवादों को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन था।

उद्धव ठाकरे ने मंच से छात्रों के संघर्ष की सराहना की और कहा कि यह केवल एक मंत्री के इस्तीफे की लड़ाई नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत है। उन्होंने दावा किया कि युवाओं की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता और यह आंदोलन देशभर में असर डाल चुका है।

उद्धव ठाकरे ने कहा, “एक कॉकरोच जिसने सरकार को सबक सिखाया यह असली विष्णु का अवतार है. यह अंधभक्कतों के खिलाफ देश भक्तों की जीत है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ‘एनडीए में इस्तीफे नहीं होते हैं’ वाले बयान पर तंज कसते हुए उद्धव ने कहा, रक्षा मंत्री ने क्या कहा है?

धर्मेंद्र प्रधान की रक्षा तो कर ही नहीं पाए.” इस रैली की सभा में राज ठाकरे ने कोई बड़ा भाषण नहीं दिया. उन्होंने मुम्बई पुलिस और दिल्ली पुलिस के काम में फर्क का जिक्र किया है. राज ठाकरे ने कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं की है, सिर्फ उद्धव ठाकरे ने सरकार और बीजेपी को घेरा है. बता दें कि बड़ी संख्या में लोगों के आने की आशंका के बीच शिवाजी पार्क को छावनी में तब्दील कर दिया गया है. इस बीच बड़ी संख्या में पुलिस बल और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात है. कई रास्तों को ब्लॉक किया गया है. इस दौरान गाड़ियों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. वहीं सिविल के भी पुलिस कर्मी तैनात है. पुलिस ने मोनिटरिंग वैन भी लगाई हैं.

इस कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 10 बजे हुई. पहले यह तिरंगा रैली होने वाली थी, लेकिन बाद में इसे विजय सभा कर दिया गया. रैली में आदित्य ठाकरे भी मौजूद रहे और इसे युवाओं से जुड़ने के बड़े राजनीतिक प्रयास के रूप में देखा गया। शिवाजी पार्क में हुई इस सभा को शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी ताकत दिखाने और छात्र आंदोलन के समर्थन के संदेश के तौर पर पेश किया।

वहीं इसी बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दिल्ली में 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया मंच एक्स पर यह पत्र साझा करते हुए लिखा कि छात्रों को मारने का आदेश किसने दिया?

उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बर्बर तरीके से बल प्रयोग किया गया और इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। राहुल गांधी ने 25 जुलाई की तारीख वाले अपने पत्र में लिखा कि छात्र एक निष्पक्ष और जवाबदेह शिक्षा व्यवस्था की मांग कर रहे थे। लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय सुरक्षा बलों ने उन पर अंधाधुंध बल प्रयोग किया। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान घातक हथियारों और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। इससे सैकड़ों छात्र घायल हुए। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि महिला छात्रों के साथ पुलिसकर्मियों ने मारपीट की और उनके निजी अंगों को भी निशाना बनाया गया।

राहुल गांधी ने अपने पत्र में दूसरा बड़ा सवाल उन लोगों को लेकर उठाया, जो कथित तौर पर सादे कपड़ों में छात्रों की पिटाई करते दिखाई दिए। उन्होंने पूछा कि क्या ये लोग पुलिसकर्मी थे या स्वयंसेवक। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि इन लोगों की तैनाती किसके आदेश पर की गई। राहुल गांधी ने कहा कि दिल्ली में तैनात सुरक्षा बल आखिरकार केंद्रीय गृह मंत्री के अधीन आते हैं, इसलिए इस कार्रवाई की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

वहीँ इसके साथ ही राहुल गांधी ने लिखा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन किसी भी लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है। उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं का समाधान निकालने की होती है। लेकिन जिस तरह की हिंसा हुई, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया है और पूरे देश को झकझोर दिया है। उन्होंने कहा कि देश के युवा और छात्र, जो भारत का भविष्य हैं, जवाब और जवाबदेही मांग रहे हैं। उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता और उनकी बात सुनी जाएगी।

राहुल गांधी ने अपने पत्र में यह भी कहा कि छात्रों की मांग शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की थी। उनका कहना है कि इस मांग का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय बल प्रयोग किया गया। उन्होंने इस पूरी घटना की जवाबदेही तय करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। यह पत्र राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को संबोधित करते हुए लिखा और बाद में अपने एक्स पोस्ट के जरिए सार्वजनिक किया। पत्र में उन्होंने सरकार से छात्र प्रदर्शन के दौरान हुई कार्रवाई पर स्पष्ट जवाब देने और यह बताने की मांग की कि बल प्रयोग का फैसला किस स्तर पर लिया गया था।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर एनसीपी-एसपी विधायक रोहित पवार ने कहा, “अब तक लोग शायद ही कभी एकजुट होते थे, लेकिन छात्रों पर हुए अन्याय ने युवाओं को एकजुट कर दिया, जिससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोग भारतीय के रूप में एक सामूहिक पहचान में बंध गए.” उन्होंने कहा, “इस एकता से मिली सफलता ने यह साबित कर दिया कि अगर हम साथ खड़े हों तो हम जीत सकते हैं. यह एक महत्वपूर्ण संदेश है जो जनता तक पहुंचा है, और हमारे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए एक अहम सबक देता है.”

इसके अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की नेता और सांसद सुप्रिया सुले ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि यह इस्तीफा छात्रों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और विपक्ष के लगातार दबाव का परिणाम है. साथ ही उन्होंने साफ किया कि सिर्फ इस्तीफा देना ही काफी नहीं है, बल्कि अब शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार और पूरे मामले पर संसद में चर्चा भी होनी चाहिए.

सुप्रिया सुले ने कहा, “शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, छात्रों और विपक्ष के निरंतर दबाव के बाद ही आया है. मैं हर उस प्रदर्शनकारी को बधाई देता हूँ जिसने #NEETUG मुद्दे पर अडिग रुख अपनाया. लेकिन यह अंत नहीं हो सकता, हम वास्तविक जवाबदेही, व्यापक शैक्षिक सुधारों और संसद में NEET मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग करते हैं.”

शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खाद्य, नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता मामले, नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.

माना जा रहा है कि सितंबर-अक्तूबर में होने वाले मंत्रिपरिषद फेरबदल तक यह मंत्रालय उन्हीं के पास रहेगा. उसके बाद हो सकता है कि या तो कोई नया शिक्षा मंत्री आए या फिर जोशी ही इस पद पर बने रहें. पर यह कहना गलत नहीं होगा कि चाहे कुछ महीनों के लिए ही सही, जोशी ने कांटों का ताज पहना है. उन्होंने एक ऐसे समय शिक्षा मंत्रालय का काम संभाला है, जब यह चर्चा और विवादों का केंद्र बना हुआ है. वैसे भी पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार में सबसे अधिक मंत्री जिस मंत्रालय ने देखे हैं. उनमें सूचना एवं प्रसारण के साथ ही शिक्षा मंत्रालय भी है.

स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर, रमेश पोखरियाल निशंक और धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब प्रल्हाद जोशी. यानी पिछले बारह साल में वे पांचवे शिक्षा मंत्री हैं और कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. हालांकि इनमें सबसे अधिक समय यानी पांच साल तक धर्मेंद्र प्रधान ही शिक्षा मंत्री रहे, लेकिन वे सरकार के दो अलग-अलग कार्यकालों में इस पद पर रहे हैं. भाजपा सरकारों में शिक्षा मंत्रालय पर इसलिए अधिक फोकस रहता है क्योंकि यह आरएसएस का पसंदीदा मंत्रालय है.

जाहिर है इस पर चर्चा भी होगी और बतौर शिक्षा मंत्री जोशी को अपनी बात भी रखनी होगी. उन्हें छात्रों को दिए गए आश्वासन का उल्लेख भी करना होगा और विपक्ष के हमले का राजनीतिक जवाब भी देना होगा. साथ ही, उनकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर मंत्रालय की प्रशासनिक साख बहाल करना, परीक्षा प्रणाली में सुधार और नीतिगत फैसलों को पटरी पर लाना होगा.

जोशी के एजेंडे में सबसे ऊपर राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी एनटीए का पुनर्गठन होगा क्योंकि प्रधान ने इस काम को अगले एक महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा है. नीट और नेट जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में हुए विवादों के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का कायाकल्प होना है.

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