कचरे को फेंकिए नहीं, कमाई का जरिया बनाइए! वर्मीकंपोस्टिंग से खुलेगा रोजगार का रास्ता
गोरखपुर में वर्मीकंपोस्टिंग को जैविक कचरे के प्रबंधन और स्वरोजगार का बेहतर साधन बताया गया। विशेषज्ञ ने जैविक खाद, वर्मीवाश और टिकाऊ खेती के फायदे समझाए।

गोरखपुर में जैविक कचरे को समस्या नहीं, बल्कि कमाई के अवसर के रूप में देखने की जरूरत पर जोर दिया गया। आर्य नगर स्थित सरस्वती विद्या मंदिर महिला महाविद्यालय में आयोजित व्याख्यान में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के प्रो. केशव सिंह ने वर्मीकंपोस्टिंग को पर्यावरण संरक्षण के साथ स्वरोजगार का साधन बताया।
जैविक कचरे से तैयार होगी जैविक खाद
प्रो. सिंह ने बताया कि पशुओं का गोबर, मुर्गी फार्म का अपशिष्ट, सूखी पत्तियां और अन्य जैविक कचरे को केंचुओं की मदद से वर्मीकंपोस्ट में बदला जा सकता है। कम लागत में तैयार होने वाली यह जैविक खाद मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरा शक्ति सुधारने में सहायक हो सकती है। वर्मीवाश का इस्तेमाल फसलों पर छिड़काव के लिए किया जाता है।
रासायनिक खाद और पराली जलाने पर चिंता
व्याख्यान में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने की बात कही गई। वहीं फसल अवशेष जलाने से खेतों के उपयोगी जीव-जंतुओं को नुकसान और वायु प्रदूषण बढ़ने की ओर भी ध्यान दिलाया गया। ऐसे में जैविक खेती और जैविक खाद को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई।
युवाओं और किसानों के लिए कमाई का अवसर
प्रो. सिंह के अनुसार घर, खेत और बागवानी से निकलने वाले जैविक कचरे का इस्तेमाल वर्मीकंपोस्ट तैयार करने में किया जा सकता है, जिसे बाजार में बेचकर आय का जरिया बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय की वर्मीबायोटेक्नोलॉजी प्रयोगशाला में वर्मीकंपोस्ट, वर्मीवाश और केंचुओं के प्रजनन से जुड़े शोध भी जारी हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या डॉ. रीना त्रिपाठी ने की।
रिपोर्ट – अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर
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