रेप केस के फैसलों में जजों के लिए क्या जरूरी? HC की 5 चर्चित टिप्पणियों पर एक नजर
रेप जैसे गंभीर अपराधों में अदालतों की कानूनी व्याख्या पर हाल के कुछ फैसलों ने देशभर में बहस छेड़ दी है. पायजामा की डोरी खोलने से लेकर कपड़ा उठाने तक, हाई कोर्ट की टिप्पणियां चर्चा में रहीं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: रेप जैसे गंभीर अपराधों में अदालतों की कानूनी व्याख्या पर हाल के कुछ फैसलों ने देशभर में बहस छेड़ दी है. पायजामा की डोरी खोलने से लेकर कपड़ा उठाने तक, हाई कोर्ट की टिप्पणियां चर्चा में रहीं.
देशभर में अगर किसी भी शख्स के साथ कोई अमानवीय घटना होती है, तो वो कानून का सहारा लेता है. लेकिन, जब कानून बनाने वाले ही उस अपराध की गंभीरता न समझे, तो पीड़ित आकिर जाए, तो जाए कहां. खासकर कि रेप जैसे संगीन अपराध के मामले में पीड़ित हमेशा ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं.
हालांकि, कुछ लोगों को न्याय भी मिलती है, लेकिन पिछले कुछ वक्त में कोर्ट की तरफ से रेप के कानून को लेकर कोर्ट की तरफ से ऐसे फैसले सुनने में आए हैं, जो कि लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों का फैसला सिर्फ आरोपी और पीड़ित तक सीमित नहीं रहता. ऐसे फैसले यह भी तय करते हैं कि समाज महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, उनकी गरिमा और न्याय की प्रक्रिया को किस नजर से देखता है.
पिछले कुछ समय में अलग-अलग हाई कोर्ट के कुछ फैसलों और टिप्पणियों ने इसी वजह से बड़ा सवाल खड़ा किया है. कहीं कपड़े के ऊपर से यौन स्पर्श को लेकर ऐसी कानूनी व्याख्या सामने आई जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया, तो कहीं रेप के प्रयास और तैयारी के बीच अंतर को लेकर कोर्ट की टिप्पणी विवाद में आ गई.
झारखंड हाई कोर्ट के फैसले पर बवाल
हाल ही में इस बात की चर्चा झारखंड हाई कोर्ट के आए फैसले के बाद से बढ़ गई है. हाई कोर्ट ने एक मामले में कहा है कि आधी रात घर में घुसने, महिला के कपड़े उठाने और उसे पकड़ने को अपने आप में रेप का प्रयास साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया.
इन फैसलों को लेकर बहस सिर्फ कानून की तकनीकी व्याख्या तक नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि यौन अपराधों की सुनवाई करते समय अदालतों की भाषा और संवेदनशीलता कैसी होनी चाहिए.
हाई कोर्ट के विवादित फैसलों पर क्यों उठे सवाल?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का पायजामा की डोरी खोलना वाला फैसला
पटना हाई कोर्ट का ‘सलवार खींचना और सीना दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं’ वाला फैसला
बॉम्बे हाई कोर्ट का ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ (Skin-to-Skin) फैसला
झारखंड हाई कोर्ट ने कहा, “रात में किसी महिला के घर में घुसना और उसके कपड़े उठाना रेप का प्रयास नहीं
पेनिट्रेशन न होने पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला
किन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने किया रुख
इस तरह के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है. फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित आदेश को पलट दिया, जिसमें नाबालिग लड़की के साथ कथित तौर पर यौन हरकत करने और उसके कपड़े नीचे करने की कोशिश को रेप का प्रयास नहीं, बल्कि केवल तैयारी माना गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी की मंशा साफ हो, वह उस दिशा में ठोस कदम उठा चुका हो और बाहरी लोगों के हस्तक्षेप से अपराध आगे न बढ़ पाए, तो मामला केवल तैयारी का नहीं बल्कि प्रयास का हो सकता है.
वेबसाइट पर हैंडबुक की अपलोड
पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर भी गंभीर चिंता जताई और जजों के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की.
अब मद्रास हाई कोर्ट ने यौन अपराधों और संवेदनशील पीड़ितों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले जजों के लिए Judgments and Gender नाम की हैंडबुक जारी की है. यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तैयार की गई है, ताकि फैसलों में संवेदनशील और सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल हो.
हैंडबुक में पीड़ितों की सुरक्षा, मुआवजा, कोर्टरूम व्यवहार और गवाही से जुड़े दिशा-निर्देश दिए गए हैं. इसमें जजों को ऐसे शब्दों से बचने की सलाह दी गई है, जो पीड़ित को दोषी ठहराने या उसके प्रति पूर्वाग्रह दिखाने वाले हों. दस्तावेज में यौन अपराधों से जुड़े 27 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी संदर्भ दिया गया है.
झारखंड हाई कोर्ट की टिप्पणी
झारखंड हाई कोर्ट के एक पुराने मामले में रेप के प्रयास की कानूनी परिभाषा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई. मामले में आरोपी पर रात में महिला के घर में घुसने, उसे पकड़ने और उसके कपड़े उठाने जैसे आरोप थे. अदालत ने कहा कि केवल घर में घुसना या महिला को पकड़ना अपने आप में रेप के प्रयास को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
अदालत के मुताबिक, यह भी दिखना चाहिए कि आरोपी ने रेप करने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया था जो अपराध को पूरा करने की कोशिश को साबित करता हो. इस आधार पर रेप के प्रयास से जुड़ी सजा में बदलाव किया गया. इस फैसले ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया कि गंभीर और आपत्तिजनक यौन व्यवहार को कानून की अलग-अलग धाराओं में कैसे वर्गीकृत किया जाए.
बिहार का मामला और कपड़े हटाने की कोशिश
बिहार से जुड़े एक मामले में पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी भी चर्चा में आई. आरोपी पर महिला के साथ जबरदस्ती करने, उसके सीने पर दबाव डालने और सलवार खोलने की कोशिश करने के आरोप थे. अदालत ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर यह देखा कि क्या आरोपी के कदम रेप के प्रयास की कानूनी कसौटी को पूरा करते हैं.
इस तरह के मामलों में अदालत को सिर्फ आरोपी के व्यवहार को नहीं, बल्कि उसकी मंशा और अपराध को पूरा करने की दिशा में उठाए गए कदमों को भी देखना होता है. अदालत ने इसे महिला की मर्यादा भंग (Outraging Modesty) का मामला माना.
इलाहाबाद हाई कोर्ट का मामला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने भी यौन अपराधों में ‘रेप की कोशिश’ और ‘तैयारी’ के बीच अंतर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा किया. मामले में आरोपी पर नाबालिग लड़की के साथ यौन हरकत करने और उसके कपड़े नीचे करने की कोशिश का आरोप था. हाई कोर्ट ने इसे रेप के प्रयास के बजाय रेप की तैयारी माना था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि अगर आरोपी ने अपराध को अंजाम देने की दिशा में ठोस कदम उठा लिया है और किसी बाहरी वजह से अपराध पूरा नहीं हो पाया, तो उसे महज तैयारी नहीं कहा जा सकता. इस फैसले ने यह सवाल भी खड़ा किया कि यौन अपराधों के मामलों में आरोपी की मंशा और उसके किए गए कदमों को अदालत किस तरह देखती है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का मामला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक मामले में अदालत ने रेप और रेप के प्रयास के बीच अंतर को लेकर फैसला दिया. मामले में आरोपी पर महिला के साथ दुष्कर्म का आरोप था, लेकिन अदालत ने उपलब्ध सबूतों को देखते हुए पूर्ण रेप साबित नहीं माना.
हाई कोर्ट ने कहा कि महिला गुप्तांग में बिना पेनिट्रेशन के ही अगर इजैक्युलेशन हो जाए तो इसे दुष्कर्म नहीं सिर्फ कोशिश माना जा सकता है, इसलिए मामले को रेप के बजाय रेप के प्रयास के तौर पर देखा गया. इस आधार पर सजा में भी बदलाव किया गया. इस फैसले के बाद फिर बहस शुरू हुई कि किसी मामले में शारीरिक संबंध स्थापित न होने पर अपराध को किस कानूनी श्रेणी में रखा जाए.
बॉम्बे हाई कोर्ट का ‘स्किन-टू-स्किन’ मामला
बॉम्बे हाई कोर्ट का एक फैसला यौन अपराधों से जुड़े मामलों में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. POCSO के एक मामले में अदालत ने माना था कि बच्चे के शरीर के संवेदनशील हिस्से को कपड़े के ऊपर से छूना, संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत यौन हमला नहीं माना जा सकता, क्योंकि त्वचा से त्वचा का सीधा संपर्क नहीं हुआ था.
इस टिप्पणी के बाद देशभर में सवाल उठे कि क्या कानून में यौन अपराध की परिभाषा को इतनी संकीर्ण तरीके से देखा जा सकता है. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस व्याख्या को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि POCSO कानून का मकसद बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा देना है और अपराध की गंभीरता को केवल ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क के आधार पर तय नहीं किया जा सकता.



