व्हाट्सएप का खेल खुला, सुप्रीम कोर्ट तक चुनाव आयोग को खींचा
चुनाव आयोग जैसी बड़ी संवैधानिक और जिम्मेदार संस्था इस समय व्हाट्सएप के जरिए चलाई जा रही है। और आज यही कारण है कि आयोग के कर्मचारी एक एक करके चुनाव आयोग का काम छोड़कर भाग रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सोचिये क्या हो अगर चुनाव आयोग के 50 अधिकारी एक झटके में अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। इस वक़्त पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल की तरफ है और देश देख रहा है कि किस तरह से यहां एसआईआर को जमीन पर उतारा जा रहा है।
अब देखिए जब भी एसआईआर या चुनाव आयोग की आलोचना की जाती है तो भाजपाई कहते हैं कि देश की संवैधानिक संस्था को तोड़ने को कमजोर करने की साजिश रची जा रही है। लेकिन उस संवैधानिक संस्था को विपक्ष क्या कमजोर करेगी जो खुद अपना काम व्हाट्सएप के जरिये करती हो। चुनाव आयोग जैसी बड़ी संवैधानिक और जिम्मेदार संस्था इस समय व्हाट्सएप के जरिए चलाई जा रही है। और आज यही कारण है कि आयोग के कर्मचारी एक एक करके चुनाव आयोग का काम छोड़कर भाग रहे हैं। आप आजतक की इस खबर को देखिए जो कहती है कि- ‘बंगाल में SIR पर बवाल, 50 BLO ने दिया इस्तीफा, BDO ऑफिस में जमकर तोड़फोड़’ इस हेडलाइन से आपको अंदाजा हो गया होगा कि किस तरह से इस पश्चिम बंगाल ज्ञानेश कुमार के लिए कहर बनकर टूट रहा है।
वैस तो आमतौर से चुनाव से पहले राजनैतिक दलों में भगदड़ मचती है लेकिन जिस तरह से इस वक्त पश्चिम बंगाल में SIR को जमीन पर उतारा जा रहा है उसने चुनाव आयोग में भगदड़ मचा दी है। ममता दीदी ने भाजपा से पहले चुनाव आयोग की हालत पतली कर रखी है। बाकी की कसर चुनाव आयोग खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर कर ले रहा है। आज तक में छपी इस खबर के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का ब्लॉक में SIR प्रक्रिया को लेकर हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं. SIR के नाम पर आम लोगों को परेशान किए जाने का आरोप लगाते हुए फरक्का ब्लॉक के सभी बूथ लेवल ऑफिसर ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा दे दिया है. यह इस्तीफा बुधवार सुबह फरक्का ब्लॉक इलेक्शन ऑफिसर यानी ERO को सौंपा गया.
अब आप सोचिए जो खुद चुनाव आयोग के इतने महत्वपूर्ण योद्धा हैं जिनके कंधों पर पूरी चुनाव की प्रक्रिया टिकी हुई है अगर वो ही चुनाव आयोग छोड़ द्ंगे तो चुनाव आयोग का क्या हाल होगा। लेकिन इनके नौकरी छोड़ने के कारण भी छोटे नहीं हैं। इन BLOs का आरोप है कि चुनाव आयोग की ओर से बिना किसी साफ और ठोस दिशा निर्देश के बार बार WhatsApp के जरिए बदलते हुए आदेश भेजे जा रहे हैं. अब देखिए एक तो सरकारी संस्था जो कागजों पर चलनी चाहिए वो पहले तो WhatsApp का इस्तेमाल कर रही है, दूसरी ये कि उससे बदलते हुए आदेश भेजे जा रहे हैं. पहले कहा गया था कि केवल फॉर्म भरने से प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, लेकिन बाद में सुनवाई के नाम पर आम लोगों को बार बार फोन कर बुलाया जाने लगा.
इसी SIR प्रक्रिया के तहत हुई सुनवाई के दौरान फरक्का BDO कार्यालय में तोड़फोड़ की घटना भी सामने आई है. बताया जा रहा है कि करीब 30 से अधिक BLO के एक प्रतिनिधिमंडल ने SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां रखीं. यह प्रतिनिधिमंडल फरक्का के तृणमूल कांग्रेस विधायक मोनिरुल इस्लाम के नेतृत्व में पहुंचा था. इसी दौरान माहौल बिगड़ गया और तोड़फोड़ हुई. तो अब आप समझ सकते हैं कि आखिर किस तरह से SIR को लेकर न सिर्फ सरकार या जनता में आक्रोश पनप रहा है बल्कि खुद चुनाव आयोग के अधिकारी आयोग के इस फैसले से कितन नाखुश हैं।
तोड़फोड़ को लेकर आरोप लगाए गए कि विधायक मोनिरुल इस्लाम के SIR प्रक्रिया में धार्मिक आधार पर पक्षपात को लेकर दिए गए बयान के बाद स्थिति बिगड़ी. एक वीडियो में विधायक को यह कहते हुए सुना गया कि अगर कोई अपना नाम राम बताता है तो उससे कोई दस्तावेज नहीं मांगे जाते, लेकिन अगर कोई अपना नाम रहीम बताता है तो उसे परेशान किया जा रहा है. BLO का दावा है कि मौजूदा प्रक्रिया से कई असली वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से कटने का खतरा है. जिन लोगों के छह बच्चे हैं, उनसे भी सवाल पूछे जा रहे हैं, जबकि संविधान में बच्चों की संख्या को लेकर कोई नियम नहीं है.
BLO ने कहा कि वे सभी पेशे से स्कूल शिक्षक हैं और स्कूल की जिम्मेदारी के साथ यह अतिरिक्त और उलझाने वाला काम करना उनके लिए संभव नहीं है.BLO के मुताबिक, आम लोगों के साथ अन्याय और अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा पाने में असमर्थता के कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देना पड़ा. इस पूरे घटनाक्रम से फरक्का ब्लॉक के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भारी हलचल मच गई है. वहीं इस पूरे मामले से ये बात तो साफ हो गई कि चुनाव आयोग के टॉप अधिकारी SIR के लिए राज्य के अधिकारियों को व्हाट्सएप पर ऑर्डर भेजते हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही इसको लेकर द रिपोर्टर्स कलेक्टिव में खुलासा हुआ था कि पश्चिम बंगाल में ECI के टॉप अधिकारी ने SIR के लिए राज्य के अधिकारियों को व्हाट्सएप पर ऑर्डर भेजे हैं। वहीं इस रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के सबसे बड़े अधिकारी, यानि चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर ने राज्य के अधिकारियों को व्हाट्सएप के जरिए अनौपचारिक तरीके से निर्देश भेजे। इन निर्देशों से वोटर लिस्ट की SIR के नियमों में बदलाव कर दिया गया।द रिर्पोटर्स कलेक्टिव ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की है कि इनमें से कुछ निर्देश चुनाव आयोग के लिखित आदेशों के खिलाफ थे।
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी ने सबसे पहले यह आरोप लगाया था। वहीं, द रिर्पोटर्स कलेक्टिव ने कई राज्य अधिकारियों और चुनाव आयोग के एक सूत्र के जरिए इन व्हाट्सएप मैसेजेस की सामग्री की स्वतंत्र पुष्टि की है। वहीं इस बीच ममता दीदी का बयान सामने आता है कि चुनाव आयोग व्हाट्सएप पर चल रहा है। मुझे यह कहते हुए बहुत दुख हो रहा है, लेकिन एक दिन ऐसा चुनाव आयोग गायब हो जाएगा।
वहीं एक तरफ जहां एक तरफ व्हाट्सएप मैेज को लेकर ममती दीदी बरसती हुई दिखाई दी वहीं इसको लेकर उनकी पार्टी चुनाव आयोग को कोर्ट तक खींच लाई। दरअसल, SIR में मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को लेकर TMC के सांसदों द्वारा याचिका दायर की गई थी। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को चुनाव आयोग से इस अंतरिम याचिका पर जवाब मांगा है। यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष आया. डेरेक ओ’ब्रायन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पीठ के सामने तर्क दिया कि चुनाव आयोग द्वारा ‘SIR’ से संबंधित निर्देश व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से जारी किए जा रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि इसकी वजह से बूथ स्तर के अधिकारी बिना किसी औपचारिक या आधिकारिक आदेश के कार्रवाई कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने चुनाव आयोग को दोनों टीएमसी सांसदों की याचिकाओं पर एक साझा जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया. इस मामले में अगली सुनवाई 19 जनवरी को होगी.
इस पूरे घटनाक्रम को देखकर यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था अपने ही बनाए नियमों से भटक चुकी है। जिस चुनाव आयोग पर लोकतंत्र की नींव टिकी है, वही अगर व्हाट्सएप संदेशों के सहारे फैसले लेने लगे, तो भरोसे की दीवार कब ढहेगी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। पश्चिम बंगाल में SIR के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरा सवाल है। जब बूथ लेवल ऑफिसर जैसे ज़मीनी योद्धा सामूहिक इस्तीफा देने को मजबूर हो जाएं, तो यह समझ लेना चाहिए कि समस्या गंभीर है, मामूली नहीं। यह मामला केवल तकनीकी खामियों का नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही का है। अगर निर्देश लिखित आदेशों के बजाय अनौपचारिक मैसेज के ज़रिये भेजे जाएंगे, तो भ्रम, असंतोष और अविश्वास फैलना तय है।
इससे न सिर्फ कर्मचारियों का मनोबल टूटता है, बल्कि आम जनता के मन में भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा होता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि असली मतदाताओं के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है, जो सीधे-सीधे लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।आज देश को ऐसे चुनाव आयोग की जरूरत है जो न सिर्फ निष्पक्ष हो, बल्कि दिखे भी निष्पक्ष। नियम कागज़ों पर हों, आदेश आधिकारिक हों और प्रक्रिया पारदर्शी हो। वरना जिस संस्था से लोकतंत्र को मज़बूती मिलनी चाहिए, वही अगर सवालों के घेरे में आ जाए, तो नुकसान सिर्फ किसी एक राज्य का नहीं, पूरे देश का होगा।



