मिडिल ईस्ट से पहले ग्रीनलैंड में बनने लगे जंग के आसार, ट्रंप के बयान ने बढ़ा दी हलचल!

गृहयुद्ध के हालात के बाद जहां एक ओर दुनिया में अंदाजा लगाया जा रहा था कि ईरान- अमेरिका जंग शुरु हो सकती है लेकिन अब ट्रंप का दिगाम अचानक ग्रीनलैंड की बर्फीली वादियों के बीच घूम गया हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ईरान में गृहयुद्ध के हालात के बाद जहां एक ओर दुनिया में अंदाजा लगाया जा रहा था कि ईरान- अमेरिका जंग शुरु हो सकती है लेकिन अब ट्रंप का दिगाम अचानक ग्रीनलैंड की बर्फीली वादियों के बीच घूम गया हैं।

बड़ी खबर निकल कर सामने आई है कि ट्रंप ने दावा पेश कर दिया है कि वो ग्रीनलैंड के मामले पर अब पीछे हटने वाले नहीं है और उन्होंने अपने सेना की स्पेशल फोर्स से भरा नोराड विभाग ग्रीन लैंड की तरफ रवाना कर दिया है। तो दूसरी ओर नाटो देश भी पीछे हटते हुए नहीं दिख रहे हैं। यूरोपीय देशों ने 40 सैनिकों का एक जत्था ग्रीनलैंड के लिए रवाना किया है। ऐसे में न सिर्फ हड़कंप मचा हुआ है कि बल्कि  जंग होने आहट तेज हो गई और कहा जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप पूरी दुनिया को एक महायुद्ध की आग में झोंकने जा रहे हैं? क्या एक शख्स की ज़िद अरबों लोगों की जान लेने पर तुली है? आखिर ट्रंप ग्रीनलैंड पर क्यों कब्जा करना चाहते हैं। ये सबकुछ हम आपके साथ अपनी इस आठ मिनट की रिपोर्ट में चर्चा करने वाले हैं।

ग्रीनलैंड को लेकर एक बार फिर से अमेेरिका और यूरोप आमने सामने खड़े हो गए हैं। ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर डेनमार्क से बढ़ते विवाद के बीच अमेरिका ने नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड नोराड का एक सैन्य विमान ग्रीनलैंड भेजा है। खबर आ रही है कि यह विमान जल्द ही पिटुफिक स्पेस बेस पहुंचेगा। नोराड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि यह तैनाती पहले से तय सैन्य गतिविधियों के तहत की जा रही है। कमांड ने साफ किया कि इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी डेनमार्क और ग्रीनलैंड को दी गई है। ट्रम्प की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी के बीच डेनमार्क ने भी ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सोमवार को कई विमान डेनमार्क के सैनिकों और सैन्य उपकरणों को लेकर ग्रीनलैंड पहुंचे। नोरार्ड के बयान के मुताबिक, पिटुफिक स्पेस बेस पर पहुंचने वाला यह विमान अमेरिका और कनाडा के ठिकानों से संचालित अन्य विमानों के साथ मिलकर लंबे समय से तय रक्षा गतिविधियों में शामिल होगा। इन गतिविधियों को अमेरिका, कनाडा और डेनमार्क के बीच चली आ रही रक्षा साझेदारी का हिस्सा बताया गया है। नोरार्ड ने यह भी कहा कि इस तैनाती के लिए जरूरी सभी कूटनीतिक मंजूरियां ली गई हैं। वहीं दूसरी ओर वहीं  दूसरी ओर अमेरिकी कदम से पहले ही  कदम डेनमार्क की अगुआई में हुए एक सैन्य अभ्यास ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस के बाद सामने आया है। यह अभ्यास ग्रीनलैंड में हुआ था, जिसमें जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी सीमित संख्या में अपने सैनिक भेजे थे। आपको बता दें कि डेनमार्क पहले से ग्रीनलैंड में करीब 200 सैनिक तैनात किए हुए है। इसके अलावा 14 सदस्यीय सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल भी वहां मौजूद है, जो आर्कटिक इलाकों में गश्त करते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि आने वाले दिनों में इन्हें जमीन, हवा और समुद्र के जरिए और मजबूत किया जाएगा। यह संख्या छोटी है, लेकिन यह राजनीतिक संदेश देने के लिए है कि नाटो एकजुट है।

डेनमार्क की अगुआई में चल रहा ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस एक सैन्य अभ्यास है। इसका मकसद यह देखना है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने पड़े, तो उसकी तैयारी कैसी होगी। डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस अभ्यास का फोकस आर्कटिक इलाके में सहयोगी देशों के बीच तालमेल और काम करने की क्षमता बढ़ाने पर है। आगे चलकर इससे भी बड़ा मिशन लाने की योजना है, जिसे ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री कहा जा रहा है। यह एक नाटो मिशन होगा। इसका उद्देश्य ग्रीनलैंड और उसके आसपास के इलाकों में निगरानी बढ़ाना और किसी भी खतरे का सैन्य जवाब देने की ताकत मजबूत करना है।

ऐसे में साफ है कि अमेरिका हो या डेनमार्क और नोटो दोनों तरफ से तैयारियों चल रही हैं। नोटो देश किसी भी कीमत पर अमेरिका के सामने झुकते नहीं दिख रहे हैं  यरोपीया देश पहले ही ये बात साफ कर चुके हैं कि वो ग्रीनलैंड मामले पर किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि फिर ट्रंप का बयान आया है और इस बयान ने हड़कंप मचा दिया हैं।

ट्रंप ने साफतौर पर कहा है कि वो किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड मामले से पीछे हटने वाले नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को नाटो चीफ मार्क रुटे से फोन पर बात की है। बातचीत में ग्रीनलैंड के मुद्दे पर स्विट्जरलैंड के दावोस बैठक बुलाने का फैसला लिया गया। हालांकि उन्होंने बैठक की तारीख नहीं बताई। ट्रम्प ने े रुटे को साफ तौर पर बताया कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि दुनिया में शांति ताकत के जरिए ही कायम की जा सकती है और अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। फोन कॉल के बाद ट्रम्प ने नाटो चीफ मार्क रुटे का एक प्राइवेट मैसेज सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किया। इसमें रुटे कहा कि वह ग्रीनलैंड को लेकर आगे का रास्ता निकालने के लिए प्रतिबद्ध हैं और ट्रम्प से जल्द मिलने को एक्साइटेड हैं। ट्रम्प कहा कि इस मुद्दे (ग्रीनलैंड) पर पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है।

ऐसे में ग्रीनलैंड में टकारव की स्थिति गंभीर होती जा रही है, आपको बता दें कि दो दिन पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों ने इस बात का विरोध जताया था कि उनकी स्वायत्ता पर हमला नहीं होना चाहिए लेकिन इसके बाद भी ताकत के नशे में चूर ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते है।

लेकिन इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कौन सी वजह है कि ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं। तो जवाब है कि जो जिस काम के लिए ट्रंप ने वेनेजुएला पर कब्जा किया है वही काम ट्रंप ग्रीनलैंड मंे करना चाहते हैं। ग्रीनलैंड में खनिज संपदा का विशाल भंडार है, जिसमें दुर्लभ पृथ्वी तत्व , लिथियम, लौह, तांबा, जस्ता, चांदी और तेल-गैस शामिल हैं, जो आधुनिक तकनीक के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बर्फ और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण अन्वेषण और खनन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, हालांकि अब तक केवल सीमित खोज और अन्वेषण हुआ है, फिर भी बड़ी क्षमता बर्फ के नीचे दबी हुई है। दक्षिणी ग्रीनलैंड में कुआनेफजेल्ड  में दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक, लगभग 28.2 मिलियन टन दुर्लभ पृथ्वी ऑक्साइड का अनुमान है, जिसमें भारी दुर्लभ पृथ्वी तत्व भी शामिल हैं।

इसके अलावा अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने पूर्वी ग्रीनलैंड क्षेत्र में लगभग 31.387 बिलियन बैरल तेल समकक्ष तेल, गैस और प्राकृतिक गैस तरल पदार्थ होने का अनुमान लगाया है। साथ ही ग्रेफाइट, लिथियम, लौह, तांबा, जस्ता, सीसा, कोयला, हीरे, और कीमती रत्न जैसे नीलम, पन्ना और रूबी भी मौजूद हैं।  ग्रीनलैंड का अधिकांश भाग बर्फ से ढका है, जिससे अन्वेषण और खनन मुश्किल हो जाता है; यह अभी भी अन्वेषण न किया गया क्षेत्र माना जाता है, लेकिन बर्फ पिघलने से नए रास्ते खुल रहे  चीन का इस क्षेत्र पर दबदबा कम करने और पश्चिमी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ की इसमें गहरी रुचि दिखा रहे हैं। क्योंकि जो री पृथ्वी धातु कहा जाता है उसकी हर देश को जरुरत है। क्योंकि जितने भी मोबाइल या फिर इलेक्ट्रिक से चलने वाले वाहन बनते हैं, इसमें री धातु का सबसे अधिक योगदान है और री धातु ग्रीनलैंड में सबसे ज्यादा बताई जाती है।

ऐसे में ट्रंप वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा चाहते हैं। हालांकि ट्रंप इसमें कितना कामयाब होंगे, ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन एक बात जो पूरी तरह से साफ है वो यह है कि ग्रीन लैंड को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देश पूरी तरह से आमने सामने आ चुके हैं। अगर नोटो की बैठक में कोई सही फैसला नहीं आया तो एक बार तय है कि ग्रीनलैंड पर ट्रंप कब्जा होना तय है क्योंकि पूरा नाटो मिलकर भी अमेरिका को हराने की ताकत नहीं है लेकिन अगर ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जा किया तो यह बात बहुत हद तक साफ है कि नाटो टूट जाएगा और इंग्लैंड को छोड़कर बाकी यूपरोपीय देश ट्रंप और अमेरिका के खिलाफ खड़े हो जाएंगे।

ट्रंप को लगता है कि वो 21वीं सदी के अलेक्जेंडर द ग्रेट हैं। उन्हें लगता है कि वो जिस जमीन पर उंगली रख देंगे, वो अमेरिका की हो जाएगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या हम एक महायुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं? मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है, रूस-यूक्रेन पहले से ही जल रहे हैं, और अब ट्रंप ने ग्रीनलैंड में एक नया मोर्चा खोल दिया है। अगर अमेरिकी सेना और डेनमार्क-नाटो के सैनिकों के बीच एक भी गोली चली, तो उसका नतीजा क्या होगा?

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