मीरजापुर में बेख़ौफ़ जल रही पराली, कागजों में जागरूकता और ज़मीनी हकीकत में खामोशी

मीरजापुर में खेतों में बेख़ौफ़ पराली जलाने का सिलसिला जारी है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ रहा है। जागरूकता अभियान कागजों तक सीमित दिख रहा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क:  मीरजापुर के खेतों में इन दिनों जो दृश्य सामने आ रहा है, वह सिर्फ पर्यावरणीय चिंता नहीं बल्कि प्रशासनिक ढिलाई पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। एक तरफ जहां सरकार और कृषि विभाग पराली जलाने को रोकने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चलाने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। खेतों में बेख़ौफ़ होकर पराली जलाई जा रही है और इसे रोकने-टोकने वाला कोई नज़र नहीं आता।

सीमावर्ती गांवों में सबसे ज्यादा स्थिति चिंताजनक

मीरजापुर जिले में विशेष रूप से राजगढ़ और हलिया विकास खंड के सीमावर्ती गांवों में पराली जलाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सोनभद्र जिले की सीमा से सटे भांवा, पचोखरा, लूसा और धनसिरियां जैसे गांवों में खेतों में धड़ल्ले से पराली जलाई जा रही है। वहीं मध्यप्रदेश की सीमा से जुड़े हलिया क्षेत्र के पवारी, बंजारी, सिकटा, देवरी और मनिगढ़ा जैसे गांवों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। इन इलाकों में पराली जलाने का सीधा असर खेतों की मिट्टी की उर्वरता पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह आदत लंबे समय में कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

कागजों में सख्ती, जमीन पर ढील

सरकार और कृषि वैज्ञानिक लगातार यह कहते रहे हैं कि पराली जलाना पर्यावरण और मिट्टी दोनों के लिए हानिकारक है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्रों और ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों को निगरानी की जिम्मेदारी भी दी गई है। यहां तक कि ड्रोन कैमरों और सैटेलाइट के जरिए निगरानी की बात भी कई बार सामने आई, लेकिन मीरजापुर में इसका प्रभाव लगभग न के बराबर दिखाई देता है। हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय राजमार्गों और हाईवे के किनारे तक खेतों में पराली जलती दिखाई देती है, लेकिन मौके पर कोई ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आती।

विशेषज्ञों की चेतावनी, फिर भी अनदेखी

Rajiv Gandhi South Campus BHU Barkachha KVK के अध्यक्ष प्रोफेसर श्रीराम सिंह का कहना है कि पराली जलाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और यह मिट्टी की सेहत के लिए गंभीर खतरा है। उनके अनुसार कृषि विज्ञान केंद्र समय-समय पर किसानों के बीच जागरूकता कार्यक्रम और गोष्ठियों का आयोजन करता है, ताकि किसानों को इसके नुकसान समझाए जा सकें। वे यह भी बताते हैं कि बढ़ती गर्मी के इस दौर में जब पहले से ही धरती का तापमान बढ़ा हुआ है, ऐसे में पराली जलाने से वातावरण और अधिक प्रदूषित होता है और मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति कमजोर होती जाती है।

पर्यावरण और कृषि दोनों पर असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि पराली जलाने से न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि खेतों की ऊपरी परत में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते हैं। इसका असर सीधे अगले फसल चक्र पर पड़ता है। किसान अल्पकालिक सुविधा के लिए जो कदम उठा रहे हैं, वह दीर्घकाल में उन्हें ही नुकसान पहुंचा सकता है।

सवालों के घेरे में प्रशासनिक निगरानी

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, तो फिर ज़मीनी स्तर पर रोकथाम क्यों नहीं हो पा रही है। क्या निगरानी तंत्र केवल कागजों तक सीमित रह गया है? या फिर कार्रवाई की इच्छाशक्ति में कमी है? मीरजापुर के ग्रामीण इलाकों में स्थिति यह है कि पराली जलाना एक सामान्य प्रक्रिया की तरह होता जा रहा है, और इसे रोकने के लिए न तो पर्याप्त निगरानी दिखती है और न ही सख्त कार्रवाई।

रिपोर्ट – संतोष देव गिरी

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