8 साल की मेहनत लाई रंग, कॉल सेंटर कर्मचारी बने IPS अफसर

आईपीएस अधिकारी सूरज सिंह परिहार की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत है और ये बताती है कि सपनों की राह अक्सर मुश्किल विकल्प, मोड़ और असफलताओं से भरी होती है, लेकिन जो असफलताओं से नहीं डरता, वहीं सफल होता है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: आईपीएस अधिकारी सूरज सिंह परिहार की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत है और ये बताती है कि सपनों की राह अक्सर मुश्किल विकल्प, मोड़ और असफलताओं से भरी होती है, लेकिन जो असफलताओं से नहीं डरता, वहीं सफल होता है. सूरज अपने चौथे प्रयास में 189वीं रैंक लाकर आईपीएस अधिकारी बने थे.

यूपीएससी को यूं ही देश की सबसे कठिन परीक्षा नहीं माना जाता है. कई लोग इसकी तैयारी में अपने जीवन के 10-10 साल खपा देते हैं, लेकिन फिर भी सफल नहीं हो पाते, जबकि कुछ लोग महज 21-22 साल की उम्र में अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी क्रैक कर टॉप रैंक लाकर आईएएस-आईपीएस बन जाते हैं.

कुल मिलाकर कहें तो यूपीएससी संघर्ष और निरंतरता मांगता है. जो जितना संघर्ष करेगा और निरंतर करता रहेगा, वो एक न एक दिन सफल जरूर होगा. सूरज सिंह परिहार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उन्होंने अपने अटूट दृढ़ संकल्प से न सिर्फ यूपीएससी क्रैक किया बल्कि आईपीएस अधिकारी बन गए. आइए जानते हैं IPS सूरज सिंह परिहार की सक्सेस स्टोरी के बारे में.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर के एक छोटे से गांव के रहने वाले सूरज सिंह परिहार की शुरुआती पढ़ाई गांव के ही स्कूल से हुई. हालांकि पांचवीं कक्षा के बाद वह कानपुर के जाजमऊ चले गए, जहां हिंदी मीडियम से ही उनकी आगे की पढ़ाई जारी रही. वह बचपन से प्रतिभावान छात्रों में गिने जाते थे. साल 2000 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

हालांकि इस समारोह में उन्हें एक परेशानी का भी सामना करना पड़ा था. जब वो कार्यक्रम में उन बच्चों से मिले, जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे, तो उनमें आत्मविश्वास की कमी महसूस हुई. वो अंग्रेजी पढ़ और लिख तो सकते थे, लेकिन बोलना उनके लिए मुश्किल था. ऐसे में उन्होंने इसपर काम करना शुरू किया. अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगे, अंग्रेजी चैनल देखने लगे और शीशे के सामने अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस भी करते थे.

कॉल सेंटर में मिली नौकरी
सूरज सिंह परिहार ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में 81 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. हालांकि इसके बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति थोड़ी खराब हो गई, जिसके बाद उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर छोटा सा कोचिंग सेंटर शुरू किया. बाद में उन्हें एक कॉल सेंटर में नौकरी मिल गई, लेकिन उनके लिए ये नौकरी आसान नहीं थी. शुरुआती वॉयस और एक्सेंट टेस्ट में वो फेल हो गए थे और उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कह दिया गया. हालांकि रिक्वेस्ट करने पर बाद में उन्हें नौकरी पर रख लिया गया. इसके बाद वो न सिर्फ टेस्ट में पास हुए बल्कि टॉप परफॉर्मर भी बन गए.

नौकरी छोड़ पहुंच गए दिल्ली
हालांकि सूरज सिंह का सपना कुछ और था. इसलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली चले गए, लेकिन वहां रहना इतना आसान नहीं था. उनकी सारी सेविंग 6 महीने में ही खत्म हो गई, पर उन्होंने हार नहीं मानी और बीच का रास्ता निकाला. उन्होंने 8 बैंकों में प्रोबेशनरी ऑफिसर की परीक्षा दी और सभी में सफल रहे. फिर उन्होंने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 4 महीने काम किया, लेकिन उसके बाद वह स्टेट बैंक में चले गए. यहां वो मैनेजर के पद तक पहुंचे, लेकिन इस दौरान यूपीएससी का उनका सपना बरकरार रहा. इसलिए उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और वापस यूपीएससी की तैयारी में जुट गए.

चौथे प्रयास में हासिल की 189वीं रैंक
साल 2011 में सूरज ने यूपीएससी परीक्षा दी और इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन उनका चयन नहीं हुआ. इसके बाद 2012 में वह मेंस परीक्षा भी पास नहीं कर सके. इसके बाद साल 2013 में उन्होंने अपना तीसरा और आखिरी अटेंप्ट दिया और पास हो गए, जिसके बाद उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के लिए हुआ. हालांकि उनका सपना आईपीएस बनना था, लेकिन अब उनका ये सपना पूरा नहीं हो सकता था. इसी बीच सरकार ने अपनी नीतियों में बदलाव किया और प्रयासों की संख्या बढ़ा दी, जिससे सूरज सिंह को एक बार फिर से मौका मिला और अपने इस प्रयास में उन्होंने शानदार 189वीं रैंक हासिल की, जिसके बाद उनका चयन आईपीएस के लिए हो गया.

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